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फर्स्ट रिस्पोंडर कोर्स के लिए ग्वालियर का चयन

ग्वालियर

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 03:00 AM IST
ग्वालियर
कोर्स करने वाले व्यक्ति को दिल्ली से स्पेशल ट्रेनिंग लेकर आए रिसर्च ऑफिसर डॉ. सुनील बुचके ट्रेंड करेंगे। यह सटिर्फिकेट कोर्स राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान में कराया जाएगा। देश के 100 डॉक्टर राष्ट्रीय परिवार कल्याण केंद्र दिल्ली में अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान के डॉक्टरों से स्पेशल ट्रेनिंग लेने के बाद अब अपने-अपने प्रदेशों में गंभीर हादसे, कार्डियक अरेस्ट, गले में कुछ फंस जाने, पानी में डूबने, स्नेक बाइट, डॉग बाइट सहित गंभीर हादसों में घायलों की जान बचाने के लिए फ़र्स्ट रिस्पोंडर कोर्स संचालित करेंगे। इस कोर्स में कोई भी व्यक्ति शामिल हो सकता है। एक दिन के इस कोर्स को करने के लिए सिर्फ 100 रुपए जमा कर रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। कोर्स करने वाले व्यक्तियों को आईडी देने के पीछे भी बड़ा कारण यह है कि सामान्यतः हादसे के समय घायल व्यक्ति को बचाने के लिए कोई सामने नहीं आता। उसे लगता है कि कहीं वह पुलिस के झमेले में न फंस जाए।

फ़र्स्ट रिस्पोंडर कोर्स कराएंगे

 मप्र में ग्वालियर के राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान को फ़र्स्ट रिस्पोंडर कोर्स कराने की अनुमति दी गई है। हमारे ट्रेनर लोगों को कोर्स कराएंगे। इससे वह हादसे के वक्त बिना समय गंवाए घायलों या मरीजों की जान बचा सकें। डॉ. जीएस राजपूत, संचालक, राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान

बच सकेगी गंभीर मरीजों की जान

 हमें दिल्ली में फ़र्स्ट रिस्पोंडर कोर्स की स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है। अब हम ग्वालियर में कोर्स करने वाले लोगों को कार्डियक अरेस्ट, गले में कुछ फंस जाने, पानी में डूबने, स्नेक बाइट सहित गंभीर हादसों में घायलों की जान बचाने के तरीके बताएंगे। डॉ. सुनील बुचके, रिसर्च ऑफिसर,राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान



Exclusive

कार्डियक अरेस्ट सहित कई मामलों में पता नहीं रहता क्या करें

कार्डियक अरेस्ट, स्नेक बाइट, डॉग बाइट, गले में कुछ फंस जाने जैसे मामलों में सामने वाले व्यक्ति को यह पता नहीं रहता कि वह किस तरीके से पीड़ित या मरीज की जान बचाए। इस कारण अधिकांश केस में मरीज की मौत हो जाती है। कार्डियक अरेस्ट, सांस रुकने में किस तरह से हार्ट को पंप करना है, यह जानकारी लोगों को नहीं रहती है। इस कारण दिक्कत आती है। वहीं पानी में डूबने के बाद निकाले गए व्यक्ति को किस तरह से बचाना है, यह भी लोगों को पता नहीं रहता है और इस कारण जब तक मरीज या घायल को अस्पताल तक ले जाया जाता है, उसकी मौत हो जाती है।