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परंपरा

ढोलक पर फाग की थाप, 75 की उम्र में कम नहीं हुआ जोश सिटी रिपोर्टर|ग्वालियर 15 साल पहले केंद्र सरकार की नौकरी से...

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 04:15 AM IST
ढोलक पर फाग की थाप, 75 की उम्र में कम नहीं हुआ जोश

सिटी रिपोर्टर|ग्वालियर

15 साल पहले केंद्र सरकार की नौकरी से सेवानिवृत्त हुए 75 वर्षीय किशोरी रमण चतुर्वेदी जब ढोलक पर थाप देने के साथ जब गले से फाग गाते हैं तो उनकी आवाज और हाथ की हरकत देखते बनती है। इस उम्र में उनका जोश नई उम्र के किसी भी कलाकार को मात करता है। उन्होंने परिवार के बुजुर्गों को बचपन से फाग गाते देखा। धीरे-धीरे वे खुद भी इस मंडली के सदस्य कब हो गए पता ही नहीं चला। एजी ऑफिस में पेंशन प्रकरणों का काम देखने वाले श्री चतुर्वेदी बताते हैं कि ऑफिस का सभी काम समय पर पूरा किया। फागुन के महीने में फाग गायन के हर कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे। अफसर भी उनकी इस आदत को जानते थे, इसलिए कभी परेशानी नहीं आई।

रंग अौर उमंग के त्योहार होली पर फाग गायन का एक अलग अंदाज है, आज घर-घर घूमेंगी टोलियां

75 वर्षीय प्रेमलता मित्तल कसेरा ओली स्थित गोवर्धन नाथ की के मंदिर में रोजाना शाम को फाग गायन में शामिल होती हैं। गायकी के दौरान बीच-बीच में नई उम्र की महिलाओं को गाने की बारीकियों से भी परिचित कराती हैं। उनका कहना है कि परंपरा को यदि आगे बढ़ाना है तो नई बहुओं को ये संस्कार देने ही पड़ेंगे। भले ही तबियत नासाज हो, लेकिन फाग गायकी के लिए मंदिर तक पहुंच ही जाती हैं। वे खुद ही नहीं अपनी हमउम्र अन्य महिलाओं को भी साथ लेकर आती हैं।

सिंधिया स्कूल फोर्ट में कार्यरत 52 वर्षीय बीडी शर्मा पिछले 27 सालों से श्रीनाथ जी की हवेली के फाग उत्सव में शामिल हो रहे हैं। उनका कहना है कि उत्सव के दौरान शहर ही नहीं बल्कि बृज के रसिक भी यहां आकर फाग गायन करते हैं। मैं तो परंपरा को आगे बढ़ाने और बनाए रखने के लिए निरंतरता बना हुए हूं। काम चाहे कितना भी क्यों न हो, लेकिन ठाकुर जी के साथ फाग खेलने का आनंद ही कुछ और है।

होली के अवसर पर फाग गाते किशोरी रमण चतुर्वेदी।

सब काम छोड़कर आते हैं, सब रात गाते हैं फाग

94 साल पहले शहर से सटे सभी मंडलों को एकत्र कर फाग गायन कराने की परंपरा को अब चौथी पीढ़ी संभाल रही है। सातऊं गांव के मंडल के सदस्य नेतराम कहते हैं कि अलग-अलग स्थानों पर होने वाले कार्यक्रम की सूचना पहले ही मंडलों को दे दी जाती है। देव उठान एकादशी से शुरू होकर फाग गायकी गुड़ी पड़वा तक चलती है। नेतराम ने बताया कि वे राई आधारित फाग गाते हैं।

एक माह चलता है फाग गायन

माथुर चतुर्वेदी समाज के लोगों में फाग गायकी की परंपरा पुरानी है। बसंत पंचमी से शुरू होकर फाग के दौर रंगपंचमी तक चलते हैं। युवाओं की पर्याप्त भागीदारी होने के बाद भी बुजुर्ग ही गायकी की कमान संभाले हैं। प्रोफेसर डा. मनोज चौबे, सुधीर चतुर्वेदी, फॉरेस्ट से रिटायर्ड अफसर आनंद चतुर्वेदी आदि का उत्साह देखते ही बनता है।

महिलाओं में भी फाग की उमंग

कसेरा ओली क्षेत्र स्थित गोर्वधननाथ जी के मंदिर में शाम होते ही महिलाओं की टोली फाग गाने के लिए एकत्र हो जाती है। इस समूह की बुजुर्ग सदस्य 75 वर्षीय प्रेमलता मित्तल का कहना है कि वे 25 साल की उम्र से इस टोली की सदस्य हैं। माथुर चतुर्वेदी समाज में सुनीलम चतुर्वेदी, ममता चतुर्वेदी, विदुषी, मनीषा, दीपाली आदि फाग गायकी की कमान संभालती हैं।