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मां को था मुंह का कैंसर, सरकारी इमदाद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटता रहा बेटा और मां की मौत हो गई

कैंसर जैसी बीमारी में सरकारी इमदाद के दावे सिर्फ प्रचार-प्रसार तक ही सीमित हैं। हकीकत यह है कि मरीज के परिजन सारे...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 01:45 PM IST
कैंसर जैसी बीमारी में सरकारी इमदाद के दावे सिर्फ प्रचार-प्रसार तक ही सीमित हैं। हकीकत यह है कि मरीज के परिजन सारे काम छोड़कर आर्थिक सहायता के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन इलाज उन्हें अपनी दम पर ही कराना पड़ता है। अंतत: मरीज की मौत के बाद अफसर यह कहकर पल्ला झाड़ देते हैं कि यह सहायता सिर्फ इलाज के दौरान अस्पताल के खाते में देने के लिए ही है। इसका परिणाम यह होता है कि मरीज के इलाज में परिजन कर्जदार हो जाते हैं या फिर सहायता इतनी लेट मिलती है कि मरीज की बीमारी बहुत बढ़ चुकी होती हैै। बुधवार को ऐसा ही एक मामला सामने आया। जागृति नगर में रहने वाले पानी की टिक्की बेचने वाले युवक विकास अग्रवाल की मां की कैंसर से मौत हो गई। कैंसर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने 1 लाख 75 हजार का एस्टीमेट बनाकर दिया। 5 माह से शासन से आर्थिक सहायता के लिए कभी सीएमएचओ, कभी कलेक्टर तो कभी भोपाल के चक्कर काटे। पैसे मिले नहीं बुधवार की सुबह मां की मौत हो गई। विकास ने बताया कि उसकी मां सुनीता अग्रवाल प|ी दिवंगत सुरेश चंद्र की जुलाई में तबीयत खराब हो गई,तो जेएएच में डॉक्टरों को दिखाया। डॉक्टर ने मुंह का कैंसर बताया था।

मुख्यमंत्री स्वयं सहायता देने की कर गए थे घोषणा: दहीमंडी निवासी गिरीश अग्रवाल को मुंह का कैंसर हुआ था। दो साल पहले सीएम ग्वालियर प्रवास के दौरान स्वयं घोषणा करके गए थे कि गिरीश के इलाज का पूरा खर्चा शासन उठाएगा। गिरीश के इलाज में करीब 7 लाख रुपए खर्च हुए लेकिन शासन की ओर से कोई भी मदद नहीं मिली। तीन माह पहले गिरीश अग्रवाल की मौत हो चुकी है। गिरीश अग्रवाल के परिवार पर मुसीबत का पहाड़ इस कदर टूटा कि इसी बीमारी से गिरीश की मौत से महज दो सप्ताह पहले उनकी मां की मौत भी कैंसर से ही हुई थी। मां और बेटे के इलाज में परिजन ने अपनी जमा पूंजी लगाने के साथ-साथ कर्जा भी लिया, लेकिन आश्वासन के बाद भी शासन ने उनकी कोई भरपाई नहीं की।

एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता मंजूर तो हुई, लेकिन 3 माह बाद भी नहीं मिल पाया पैसा

ये है प्रक्रिया: मरीज का एस्टीमेट बनाकर डॉक्टर उसके परिजन को देता है। मरीज के परिजन उसे सीएमएचओ कार्यालय में जमा कराते हैं,जहां से वह एस्टीमेट कलेक्टर कार्यालय जाता है। कलेक्टर इसका अवलोकन करते हैं और जिस मद से सहायता देनी है उसे भेज देते हैं। कलेक्टर दो लाख रुपए तक की सहायता दे सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में कोई निर्धारित समय नहीं है जिसके कारण मरीज को समय पर सहायता नहीं मिल पाती है।


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