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कोर्ट ने बेगुनाह करार दे माथे का कलंक मिटाया, जेल में गुजरे 13 साल

हाईकोर्ट ने हमें बेगुनाह करार दे दोषमुक्त का सर्टिफिकेट दे दिया।

Bhaskar News | Last Modified - Nov 18, 2017, 07:14 AM IST

  • कोर्ट ने बेगुनाह करार दे माथे का कलंक मिटाया, जेल में गुजरे 13 साल

    ग्वालियर.हाईकोर्ट ने हमें बेगुनाह करार दे दोषमुक्त का सर्टिफिकेट दे दिया। इससे हमारे माथे से गुनाहगार होने का कलंक तो मिट गया। लेकिन इस कलंक के कारण जेल में उम्र कैद की सजा में बिताए गए 13 साल में तो लगता है हमारी जिंदगी ही गुनाह हो गई है। यह दर्द है कल्लू पुत्र प्रहलाद यादव (50) का, जिसे सिर्फ अपनी दोस्ती की खातिर अपहरण आैर फिरौती के केस में, इतनी कीमत चुकानी पड़ी। वह उन सात लोगों में से एक है, जिन पर 15 साल के लड़के के अपहरण करने आैर 21 लाख की फिरौती मांगने पर सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए झूठे केस में फंसाने आैर गलत विवेचना करने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज कर सुनवाई करने के आदेश दिया है।


    - कभी हलवाई का काम करने आैर तारागंज में रहने वाले कल्लू,आतंरी बिलौआ में रहने वाले रामरतन पाल के साथ पढ़े हैं। इस नाते दोनों का आपस में संपर्क था। रामरतन आैर रामरस पाल ने अपने भाई जसवंत की शादी के लिए गांंव में ही रहने वाले विजय चौधरी से वर्ष 2000 के आसपास अपनी 17 बीघा जमीन गिरवी रख कर्ज लिया।

    - जमीन वापस करने की मांग रखी तो चौधरी के भाई शांति स्वरूप ने उनके खिलाफ भतीजे जयशंकर उर्फ विक्की (15) के अपहरण का केस दर्ज करा दिया। इस केस में कल्लू के साथ ही रामरतन के साले नवल के साथ रामरस, जसवंत, दयाराम कुशवाह आैर बल्लू उर्फ बलराम को सेशन कोर्ट ने 2004 में उम्र कैद की सजा सुना जेल भेज दिया था। हालांकि जेल में रहते हुए रामरतन की मौत हो चुकी है।


    बच्चों की जिंदगी भी बर्बाद हुई

    - रामरतन के साले नवल की पत्नी महादेवी कहती हैं- इन्हें जेल होने के बाद मजबूरन गांव ( पंचमपुरा, उटीला) छोड़ दो लड़कियों आैर एक लड़के के साथ पेट भरने शहर आना पड़ा। इधर-उधर से जो मदद मिलती, उसके सहारे वकीलों से मदद की गुहार करती रही।

    - लोगों के घरों में चौका-बर्तन कर बच्चे पाले। इस बीच दो बच्चियां समझदार हुईं तो वे भी चौका-बर्तन में हाथ बंटाने लगीं। अब तेरह साल बाद जै ( पति नवल) बेकसूर साबित होकर घर तो आ गए इसकी तसल्ली है। लेकिन इन 13 सालों में हमारी आैर हमारे बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो गई है।

    जेल में रहते बेटा खोया
    - जेल में रहते हुए मेरे तीन लड़कों में से एक की 8 साल की उम्र में बीमारी से मौत हो गई। कारण, पत्नी पर न पैसे थे न कोई सहारा जो उसका इलाज कराया। घर के नाम पर एक पाटौर थी, जो उजड़ गई।

    इसके बाद भी परिवार जैसे-तैसे बसर करता रहा। अब जेल से रिहा होने के बाद फिर से हलवाई का काम करना चाहता हूं पर कहीं से मदद मिले तब। मुझे तो दोस्ती की कीमत चुकानी पड़ी। जो पुलिसकर्मी मुझे घर से उठाकर ले गए थे, उनमें से एक सिपाही जगमोहन पाराशर तो एक हत्या के जुर्म में अभी भी जेल में बंद है।

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