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फांसी की सजा तय होने बाद इस क्रांतिकारी ने लिखी ऑटो-बायोग्राफी, मौत दो दिन पहले कर ली पूरी

फांसी की सजा तय होने बाद इस क्रांतिकारी ने लिखी ऑटो-बायोग्राफी, मौत दो दिन पहले कर ली पूरी

Danik Bhaskar

Dec 18, 2017, 07:13 PM IST
अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल के

ग्वालियर। जिस व्यक्ति को मालूम हो कि वह तीन दिन बाद इस दुनिया से चला जाएगा, ठीक उसी वक्त बायोग्राफी लिखने के लिए सामग्री मांगे, और दो दिन के अंदर काल कोठरी में 200 पन्नों की बायोग्राफी लिख डाले। ये है तो अचंभा, लेकिन सच यही है कि काकोरी ट्रेन डकैती के लीडर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने अपनी बायोग्राफी फांसी के ठीक 2 दिन पहले ही लिखी थी। फांसी के दिन मिलने आई मां तो गुपचुप बाहर भेज दी आत्मकथा....

हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक और शहीद सरदार भगत सिंह व अशफाक उल्लाह खां के गुरू शहीद राम प्रसाद बिस्मिल 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी दगई थी। बिस्मिल मूलत: मुरैना के गांव रूअर-बरवाई के निवासी थे। dainikbhaskar.com उनकी शहादत पर पेश कर रहा है उनके साहस की कहानी......

- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (HRA) के संस्थापक क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को काकोरी ट्रेन डकैती के मामले में उनके साथियों अशफाक़ उल्लाह खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी के साथ अंग्रेज सरकार ने मुकदमे के बाद फांसी की सजा सुनाई थी।

- तय हुआ था कि बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी जाएगी। 17 दिसंबर को उनके साथी राजेंद्र लाहिड़ी को तय समय से पहले ही उत्तरप्रदेश की गोंडा जेल में अचानक फांसी दे दी गई।

- खबर गोरखपुर जेल में कैद बिस्मिल तक पहुंची, तो उन्होंने बायोग्राफी लिखने का फैसला कर लिया। क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वाले कुछ अफसरों ने खुफिया तौर पर उन्हे सामग्री मुहैया करा दी। बिस्मिल ने दो दिन में 18 दिसंबर को अपनी 200 पन्नों की बायोग्राफी पूरी कर ली।

- 19 दिसंबर को फांसी के ठीक पहले उनकी मां अंतिम मुलाकात के लिए जेल पहुंचीं। उनके साथ HRA के सदस्य शिवचरण वर्मा भी बेटा बनकर जेल पहुंच गए। मुलाकात से वापसी के साथ ही खाने के डिब्बे में रख कर शिवचरण वर्मा बिस्मिल की आत्मकथा को अपने साथ ले गए।

- बिस्मल ने ये किताब इस शेर के साथ पूरी की:

मरते बिस्मिल,अशफाक़, रौशन, लाहिड़ी अत्याचार से।

होंगे पैदा सैकड़ों उनके रुधिर की धार से।।

- किताब पूरी करने और उसे बाहर भेज देने के बाद निश्चिंत भाव से 19 दिसंबर 1927 को वैदिक मंत्रों के जाप और ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारों के साथ बिस्मिल ने हंसते हुए खुद ही फांसी का फंदा अपने गले में डाल लिया था।

- ‘बिस्मिल’ के मेरा गीत रंग दे बसंती चोला....को क्रांतिकारी जेल में गाकर अपना हौसला बढ़ाते थे।

प्रकाशित होते ही हो गई जप्त

- क्रांतिकारी शिवचरण वर्मा के बड़े भाई भगवतीचरण वर्मा की कोशिश से बिस्मिल की आत्मकथा का प्रकाशन हुआ, लेकिन कुछ प्रतियां ही बंट सकी थीं कि अंग्रेज सरकार ने सभी उपलब्ध प्रतियों को जप्त कर लिया।

- दूसरी बार क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने बिस्मिल की आत्मकथा प्रकाशित कराई, लेकिन इसे भी ब्रिटिश सरकार ने जप्त कर रोक लगा दी।

- इसके बाद इसका प्रकाशन 1988 में बनारसी दास चतुर्वेदी ने कराया।

आत्मकथा में ब्रिटिश सरकार के कच्चे चिट्ठे

- शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की करीब 200 पन्नों की आत्मकथा में अपने साथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के असल मंसूबों की उदाहरण दे कर पोल खोली थी।

- उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अंग्रेज धर्म के नाम पर देश के टुकड़े करने की साजिश रच रहे हैं। इसी वजह से पुस्तक का प्रसार अंग्रेजों ने बैन कर दिया।

- यही वजह है कि अंग्रेजों ने इसे प्रसारित होने से रोका, यहां तक कि आजादी के भी 41 साल बाद तक यह पुस्तक देश में प्रकाशित नहीं हो सकी।

- बिस्मिल की किताब में साफ किया गया है कि धर्म के नाम पर किस तरह ब्रिटिश हुक्मरानों ने उन्हें व उनके साथियों को सजा माफी के लालच में बरगलाने की कोशिश की थी।

स्लाइड्स में रामप्रसाद बिस्मिल और उनकी आत्मकथा....

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