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  • Charasal, Notorious For Adulteration, Is The Brand Of Chastity In Gares Village, 50 To 200 Cows In Every Household Here, Raezana Produces 35 Thousand Liters Of Milk.

मिलावट के लिए बदनाम चंबल में शुद्धता का ब्रांड है गाेरस गांव, यहां हर घर में 50 से 200 गायें, राेजाना 35 हजार लीटर दूध का उत्पादन

2 वर्ष पहले
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  • श्योपुर से लेकर राजस्थान के कोटा, बारां, सवाई माधौपुर तक पहचान- गोरस गांव का दूध है ताे शुद्ध ही हाेगा
  • 85 साल पूर्व बसे गोरस के दूध पर लोगों को आज भी भरोसा, क्योंकि पशुधन के देवता की पारंपरिक आन निभाना अपना धर्म मानता है गुर्जर मारवाड़ी समाज
  • जिले में सर्वाधिक गोरस में हैं 22 हजार दुधारू पशु, यहां ग्रेजुएट कर चुके बेटा-बेटी भी चराते हैं गाय

नंदन शर्मा. श्योपुर । दूध में मिलावट के लिए चंबल संभाग के तीनों (श्योपुर, मुरैना और भिंड) जिले देशभर में बदनाम हाे चुके हैं। लेकिन इसी संभाग के श्योपुर जिले के जंगल में बसा हुआ एक गांव लोगों को सुकून दे रहा है। यह गांव है गोरस। इसका दूध और मावा अपने आप में शुद्धता का ब्रांड है। लोगों को भरोसा है कि गोरस से दूध आया है तो शुद्ध ही होगा। लोगों के इस विश्वास की वजह है कि गुर्जर मारवाड़ी समाज की सामाजिक मान्यता और पशुधन के देवता की आन है। मारवाड़ी समाज के लोगों का मानना है कि दूध के धंधे में मिलावट करने से पशुधन नहीं बढ़़ता है। वर्तमान में इस गांव में 22 हजार दुधारू पशु हैं, इनमें ज्यादातर गायें गिर नस्ल की हैं। रोजाना लगभग 35 हजार लीटर दूध बिकता है। गोरस से दूध श्योपुर व कोटा तक जा रहा है। खास बात यह है कि शासन स्तर पर गोरस को पहचान देने के लिए गोरस महोत्सव मनाने की शुरुआत की है। गाय पालकों को प्रोत्साहन एवं गोवंश के संवर्धन के लिए गोरस महोत्सव के मंच पर हुई बातें परवान चढ़ने का इंतजार है।

जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर शिवपुरी-पाली हाईवे और गोरस-मुरैना हाईवे के संगम स्थल पर गोरस गांव सीप नदी के पास बसा हुआ है। गांव में 800 घरों की बस्ती है। इनमें गुर्जर मारवाड़ी समाज के 250 परिवार गाय भैंस पालते हैं। जबकि करीब 600 आदिवासी परिवार मेहनत मेहनत से आजीविका चलाते हैं। वर्तमान में गांव में 22 हजार दुधारू पशु है। गुर्जर मारवाड़ी समाज में जिसके पास जितने ज्यादा गाय होती है उतनी ही समाज में बड़ी हैसियत मानी जाती है। हर परिवार के पास 50 से  200 गायें है।  दूध के उत्पादन से नियमित आमदनी होने से ग्रामीणों की माली हालत अच्छी है। हर घर में टेलीविजन है।  25 पशुपालकों के पास निजी कार व पिकअप वैन हैं। 150  मोटर साइकिल हैं।  पुरुषों के साथ महिलाएं भी बराबरी से कंधा मिलाकर गायों के लिए चारा पानी, दूध निकालने गोबर थापने जैस काम करती है। गोरस के नाथूराम गुर्जर ने कहते हैं कि करीब 85 साल पहले मारवाड़ राजस्थान से हमारे पुरखे गर्मी के सीजन में गायें चराने आए थे । यहां दूर दूर तक घना जंगल और सीप नदी में पानी देखकर गोरस में ही डेरा बसा लिया था।
 

बीए पास कान्हा चराते हैं गाय, कॉलेज जाने वाली ममता भी चराती हैं गाय 
गोरस निवासी कान्हा गुर्जर बीए पास हैं, लेकिन आज भी गाय चराने और दूध बेचने का काम करते हैं। पिता हरलाल गुर्जर ने बताया कि घर में 80 गाय हैं। तीनों बेटों को इनकी सेवा में लगा रखा है। वहीं इसी गांव की ममता गुर्जर ने कॉलेज जाने वाली पहली बेटी है। पिता नंदाजी गुर्जर ने बताया कि ममता ने इसी साल बीए पास कर लिया है। अब एमए का फार्म श्योपुर कॉलेज से प्राइवेट भरेंगी। लेकिन इस सब के बीच वह गाय जरूर चराती हैं।


गोरस महोत्सव  से बंधी थी
आस 
गोरस गांव दूध उत्पादन के लिए मशहूर  है।  गुर्जर मारवाड़ी समाज मेहनत और ईमानदारी से दूध का उत्पादन करके अपने दम पर विकास किया है। शासन से प्रोत्साहन नहीं मिला । हालांकि गोरस महोत्सव की शुरुआत से तीन साल पूर्व आस बंधी थी, लेकिन मंच पर  मंत्री और विधायकों की उपस्थिति में सिर्फ बातें होकर रह गई। सार्थक नतीजा नहीं आया है। बिशनीबाई, सरपंच ग्राम पंचायत गोरस।

 

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