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मुगल शासन में नाटक को नहीं मिला प्रोत्साहन

सिटी रिपोर्टर | ग्वालियर भारत में रंगमंच का इतिहास काफी पुराना है। नाट्यकला का विकास भारत में तेजी से हुआ। यह...

Danik Bhaskar | Apr 17, 2018, 03:00 AM IST
सिटी रिपोर्टर | ग्वालियर

भारत में रंगमंच का इतिहास काफी पुराना है। नाट्यकला का विकास भारत में तेजी से हुआ। यह परंपरा आगे बढ़ी और नाटकों में ऋग्वेद के उर्वशी, यम और यमी के संवाद देखे गए। इन संवादों से ही लोगों को पता चला कि भारत में थिएटर का विकास हुआ। इन्हीं संवादों से प्रेरणा लेकर रंगकर्मियों ने अनेक नाटकों की रचना की। उस समय ही भरतमुनि ने उसे शास्त्रीय रूप दिया। यह बात थिएटर एक्सपर्ट सचिन मजूमदार ने कही। उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि आधुनिक भारतीय नाट्य साहित्य का इतिहास एक शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है। मुगल शासनकाल में थिएटर को उतना प्रोत्साहन नहीं मिला। जबकि चित्रकला और वास्तुकला को मुगल शासकों ने आश्रय दिया। उस दौर में भारतीय नाट्य परंपरा खो गई थी। केवल रामलीला जैसी लोककलाओं ने ही थिएटर को जिंदा रखा।

ओम के उच्चारण से बढ़ता है कॉन्संट्रेशन: वर्कशॉप में एक्सपर्ट ने प्रतिभागियों को 15 मिनट तक ओम का उच्चारण कराया। उन्होंने बताया कि ओम के उच्चारण से दिमाग में कंपन होता है। इससे ही कॉन्संट्रेशन लेवल बढ़ता है। जो कि एक अभिनेता के लिए बेहद जरूरी है। इस दौरान उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया गया।

रंग शिविर में सचिन मजूमदार ने कहा कि अभिनय से पहले थिएटर का इतिहास जानें।

अंग्रेजों की वजह से भारत में आया वेस्टर्न थिएटर

अंग्रेजों ने 200 वर्षों तक भारत पर राज्य किया। उस दौरान अंग्रेजों का प्रभुत्व पूरे देश में था। ऐसे में उनके देश की अनेक परंपरा और सभ्यताओं ने हमारे देश में प्रवेश किया। उनके मनोरंजन के लिए पाश्चात्य थिएटर भी भारत का अंग बना। उन लोगों ने नाटकों मेंे अभिनय के लिए कई अभिनय शालाएं बनवाईं, जो थिएटर के नाम से विख्यात हुईं। इस ढंग का पहला थिएटर प्लासी के युद्ध के पहले कोलकाता में बन गया था। इसके बाद ‘लेफेड फेयर’, ‘एथीनियम’ और ‘चौरंगी’ थिएटर ने भारत में विशिष्ट पहचान बनाई।