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पुलिस अनुमानों में उलझी और दहशत के साये में जी रहे बुजुर्ग

लक्ष्मीबाई कॉलोनी में अकेली रह रही एक वृद्धा के घर में घुसकर डकैती डालने वाले आरोपी चार दिन बाद भी बेसुराग हैं।...

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 04:15 AM IST
लक्ष्मीबाई कॉलोनी में अकेली रह रही एक वृद्धा के घर में घुसकर डकैती डालने वाले आरोपी चार दिन बाद भी बेसुराग हैं। पुलिस बेपरवाह है और बदमाश बेखौफ। सामाजिक न्याय विभाग, वृद्धजन आयोग जैसे सरकारी अमले अपनी दहलीज नहीं लांघते। पीड़िता का कोई वोट बैंक नहीं, इसलिए अभी तक राजनेताओं ने भी उनकी सुध नहीं ली। जाहिर है, शहर में अकेले रहने वाले बुजुर्ग अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैँ।

इस मामले में पुलिस की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है। पुलिस का कहना है कि आरोपी वारदात के बाद संभवत: मुरैना भाग गए हैं। पुलिस को यह भी आशंका है कि आरोपी इस परिवार का कोई करीबी भी हो सकता है। अनुमानों में उलझी पुलिस अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। अब नए एसपी ने आरोपियों की तलाश के लिए एक टीम बनाने की बात कही है। शहर में पुलिस की सामाजिक सुरक्षा शाखा भी लंबे समय से अस्तित्व में नहीं है।

लक्ष्मीबाई कॉलोनी निवासी वृद्धा के घर डकैती डालने वाले बदमाश चार दिन बाद भी बेसुराग

बुजुर्गों की मदद के लिए डॉ. पिपरिया की पहल

तानसेन नगर निवासी डॉ.हरिशचंद्र पिपरिया पेशे से चिकित्सक हैं। 18 साल पहले तक वे कांग्रेस पार्टी में सक्रिय थे। अब पूरी तरह समाजसेवा के लिए समर्पित डॉ. पिपरिया ने अकेले रहने वाले बुजुर्गों की देखभाल का जिम्मा उठाया है। इसके लिए उनके पास एक टीम है जो पहले से ही चार शहर का नाका मुक्तिधाम के जीर्णोद्धार व लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने का काम कर रही है। बुजुर्गों की देखभाल के लिए उनकी कोशिश कुछ इस तरह की रहेगी-


बुजुर्गों के लिए काम करने वाली दो संस्थाएं


संचालक: भूपेन्द्र जैन, 9200091555


संचालक: लक्ष्मी गर्ग, 9406581416

भास्कर विचार

मुंह मत फेरिए, उन्हें रोकिए...

चार दिन हो गए। शहर के बीचोंबीच लक्ष्मीबाई कॉलोनी में 68 वर्षीय एक महिला खौफ के साए में जी रही हैं। खौफ का आलम यह है कि उन्होंने अब शहर छोड़ने का फैसला ले लिया। वृद्धों को धरोहर माना जाता है। ग्वालियर यूं भी धरोहरों का शहर है। धरोहर की उपेक्षा का यह मामला गंभीर है। चार-छह गुड़़े-बदमाशों के डर से हम हमारी धरोहर से हाथ धो बैठें, यह ठीक नहीं। हैरत यह कि चार दिन में शहर का कोई राजनेता, अफसर या समाजसेवी उस महिला को सांत्वना देने तक नहीं पहुंचा। बुजुर्गों की सुरक्षा और उचित देखभाल सरकार का भी दायित्व है और समाज का भी। साफ है कि सबने दायित्वों से मुंह फेर रखा है। क्या साढ़े 13 लाख की आबादी में से एक भी ऐसा संवेदनशील व्यक्ति नहीं है, जो जाकर उनसे कहे- अम्मा, आप यूं बदमाशों से डरकर शहर मत छोड़िए। क्या यह शहर उन्हें यूं ही चले जाने देगा? क्या कोई उन्हें रोकने के लिए आगे नहीं आएगा?