संस्कारवान माता-पिता की संतान भी होती है संस्कारित: विहसंत सागर

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:41 AM IST

Gwalior News - बच्चों को धर्म के संस्कार माता-पिता से मिलते हैं। जैसे हीरा जौहरी के पास जाने के बाद ही कीमती होता है और मिट्टी...

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बच्चों को धर्म के संस्कार माता-पिता से मिलते हैं। जैसे हीरा जौहरी के पास जाने के बाद ही कीमती होता है और मिट्टी कुम्हार के पास जाने के बाद घड़े के रूप में उपयोगी हो जाती है। उसमें जल धारण करने की समर्थता आ जाती है और मांगलिक हो जाता है, इसी प्रकार बच्चे का जीवन माता-पिता से धर्म संस्कारित होकर आदर्शमय बन जाता है। यह विचार जैन मुनिश्री विहसंत सागर ने शुक्रवार को दानाओली स्थित दिगंबर जैन वरैया मंदिर में विरागोदय संस्कार शिविर को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि संस्कार देने की उम्र बचपन से 10 वर्ष तक की सबसे उपयुक्त होती है। इस उम्र में मिले संस्कार ताउम्र साथ रहते हैं। बच्चों को ये संस्कार तभी मिल सकते हैं, जब माता-पिता संस्कारित हों। जीवन में संस्कार की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार नींव के बिना इमारत टिक नहीं सकती, उसी प्रकार संस्कार जीवन की नींव है। जैसा संस्कार होगा वैसा जीवन बनेगा। जीवन का निर्माण, भाग्य, पुरुषार्थ, संस्कार, संगति ये चार आधारभूत स्तंभ है। इनमें से संस्कार अपने आप में बड़ा अहम-भूमिका अदा करता है।

जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि मुनिश्री विश्वसूर्य सागर महाराज ने दानाओली वरैया मंदिर में शिविर में बच्चों को पूजा पद्धति और संस्कारों की जानकारी दी गई। मुनिश्री ने बच्चों को संकल्प दिलवाया की वह सुबह उठकर सबसे पहले नौ बार णमोकार मंत्र का ध्यान कर पढ़ेंगे। परिवार के सभी बड़े सदस्यों के चरण स्पर्श कर जय जिनेंद्र कहेंगे। मंदिर में आकर भगवान को नमोस्तु भगवंत कहा कर तीन बार धोका देना चाहिए। प्रतिदिन प्रातः काल भगवान की स्तुति एवं भगवान का अभिषेक और पूजा करने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। दोपहर में सुनील भंडारी ने महिलाएं वर्ग तत्वार्थ सूत्र, इष्टोंपदेश, आदि का अध्ययन कराया जा रहा है। मुनिश्री के सानिध्य में शिविर का समापन 21 मई को शिवपुरी रोड स्थित जैन कालेज में होगा।

विरागोदय संस्कार शिविर

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