युवा नींदों में बुजुर्गों के रतजगे

Gwalior News - जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक को रोना तांडव के समय एक हृदयहीन व्यक्ति ने यह विचार अभिव्यक्त किया कि...

Mar 27, 2020, 06:51 AM IST
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

को रोना तांडव के समय एक हृदयहीन व्यक्ति ने यह विचार अभिव्यक्त किया कि उम्रदराज लोगों को बेइलाज मरने दिया जाए और बच्चों तथा युवाओं को बचाया जाए। क्या उम्रदराज लोगों को जीने का अधिकार नहीं है? अगर बात कुछ ऐसी हो कि दो में से किसी एक को ही बचाया जा सकता है, तब उम्रदराज की शहादत दी जा सकती है। सदियों पुराना लतीफा है कि एक नाव में तीन व्यक्ति यात्रा कर रहे थे। नदी में बाढ़ आ गई तो नाव में भी तूफान यूं उठ खड़ा हुआ कि एक व्यक्ति को नदी में फेंक देने से दो व्यक्तियों की जान बच सकती है। मां की महिमा का बखान करने वाली इस घटना में व्यक्ति अपनी प|ी को नदी में फेंक देता है और कहता है कि प|ी तो दूसरी मिल सकती है, परंतु मां तो एक ही है। यह स्त्री के अपमान की बात है। मां और प|ी दोनों ही स्त्रियां हैं। यह दूषित विचार सदियों पुराना है। हमारे तलीफे और अपशब्द भी महिला केंद्रित रहे हैं। पूरा विचार ही तर्कहीन है।

जयंतीलाल गढ़ा ने गुरु भल्ला की फिल्म ‘शरारत’ में धन का निवेश किया। इस फिल्म में एक अनुशासनहीन घमंडी युवा से एक अपराध हो जाता है और उसे जेल नहीं भेजते हुए एक वृद्धाश्रम भेजा जाता है, जहां उसे उम्रदराज लोगों की सेवा करना है। इसी तरह राजेश खन्ना और मीना कुमारी अभिनीत दुलाल गुहा की फिल्म ‘दुश्मन’ में ट्रक ड्राइवर की चूक से एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। जज उसे दंड देते हैं कि वह मरने वाले के परिवार की सेवा करे। दंड विधान में सुधार की गुंजाइश रखी जानी चाहिए। वी. शांताराम की क्लासिक फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ इसी आदर्श से प्रेरित है। क्या उपयोगिता जीवन का एकमात्र मानदंड है? हॉलीवुड की फिल्म ‘दे शूट होर्सेस, डोंट दे’ में रेस के घायल घोड़े को गोली मार दी जाती है। यह निहायत ही अमानवीय विचार है। कोएन बंधुओं की फिल्म ‘नो कंट्री फॉर ओल्ड मैन’ का नाम ही बहुत कुछ कहता है।

सृजन शक्ति का उम्र से कोई लेना-देना नहीं है। ज्ञातव्य है कि अंग्रेजी के महान कवि कॉलरिज अफीम का सेवन करते थे। उसी तंद्रा में उन्होंने एक कविता लिखी, परंतु उसमें अंतिम पंक्तियां वे नहीं लिख पाए, क्योंकि उनकी तंद्रा टूट गई थी। उनके कवि मित्र भी उस कविता को पूरा नहीं कर पाए। उन्हें सलाह दी गई कि वे लंदन से पचास मील दूर रहने वाले एक वृद्ध कवि से मिलें, जिसे कभी सफलता नहीं मिली, परंतु वह असाधारण प्रतिभा का धनी है। उसने अनगिनत किताबें बांची हैं। बहरहाल, उस उम्रदराज विद्वान ने तुरंत अधूरी कविता को पूरा कर दिया। कॉलरिज संतुष्ट हो गए। वे जान गए कि ये ही वे पंक्तियां हैं जो उनके अवचेतन के जंगल में गुम हो गई थीं। उम्रदराज विद्वान ने पांच पाउंड का मेहनताना मांगा तो कवि कॉलरिज ने कहा कि कविता के प्रकाशन से उन्हें बमुश्किल कुछ पेन्स मिलेंगे। कॉलरिज ने उम्रदराज विद्वान से कहा कि उसने मात्र चंद क्षण ही काम किया है, जिसके लिए पांच पाउंड राशि बहुत अधिक है। उम्रदराज व्यक्ति ने कहा कि वह चंद क्षणों में अधूूरी कविता को इसलिए पूरा कर सका, क्योंकि उसने दशकों तक अध्ययन किया है। तेल की जगह खुद को जलाकर रात-रातभर अध्ययन किया है। अगर उन रतजगों के हिसाब से मेहनताना मांगा जाए तो वह पांच पाउंड के कहीं अधिक होगा। सारांश यह है कि उम्र के हर दौर का अपना महत्व है और जीवन पर छोटे-बड़े सभी अनुभवों का प्रभाव बना रहता है। ज्ञातव्य है कि अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड ने फिल्म निर्देशन अपने उम्रदराज होने पर प्रारंभ किया और महान फिल्मों की रचना की। इसी तरह जॉन वेन लंबे समय तक अपनी सितारा हैसियत कायम रख पाए। हमारे अपने अशोक कुमार ने बहुत लंबी पारी खेली है। अमिताभ बच्चन सक्रिय हैं। वी. शांताराम लंबे समय तक फिल्में बनाते रहे।

यूरोप की पुरानी फिल्म ‘ए बुक ऑफ विशेस’ का कथासार यह है कि एक अनाथालय में आग लग जाती है। सभी बच्चे बचा लिए जाते हैं, परंतु भवन नष्ट हो जाता है। अनाथालय का अधिकारी बच्चों को लेकर वृद्धाश्रम गया। तीस कमरों के वृद्धाश्रम में बमुश्किल बीस वृद्ध रहते थे। सभी उम्रदराज लोग प्राय: खामोश रहते थे और उनके बीच कोई संवाद नहीं होता था। उम्रदराज लोग बच्चों से परेशान हो गए, परंतु समय बीतने पर उन्हें बच्चों से प्रेम हो गया और बच्चों को बूढ़ों से। बूढ़े और बच्चों ने आनंद का संसार रच लिया।

एक रात एक उम्रदराज की मृत्यु हो गई। उसके साथी नहीं चाहते थे कि बच्चों को यह बात पता चले। अत: बड़े गुप्त ढंग से आधी रात को मृतक के अंतिम संस्कार की योजना बनाई गई। आधी रात को मृत देह लेकर उम्रदराज लोग कब्रिस्तान गए। उन्हें आश्चर्य हुआ कि बच्चे वहां पहले ही पहुंच चुके थे और अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। हर बच्चा तो असीम संभावना है ही, परंतु कोई उम्रदराज व्यक्ति भी अनावश्यक नहीं है। मंगलेश डबराल की पंक्तियां इसी बात को रेखांकित करती हैं-

मत भूलो कि तुम्हारी नींदों में, तुम्हारे पूर्वजों के अनगिनत रतजगे शामिल हैं।

परदे के पीछे**

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