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शैव परंपरा का गढ़ रहा है ग्वालियर यहीं से देश में हुआ इसका विस्तार

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Bhaskar News Network

Mar 20, 2019, 02:55 AM IST
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जेयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला में एमबी गर्दे स्मृति व्याख्यानमाला हुई

सिटी रिपोर्टर | ग्वालियर

ग्वालियर का भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, कला आदि क्षेत्रों में बहुत बड़ा योगदान रहा है। शैव सिद्धांत का उद्गम भी इसी क्षेत्र से हुआ है। ग्वालियर के आसपास के क्षेत्रों जैसे-कदवाहा, सुरवाया, रन्नौद आदि में शैव मठ हुआ करते थे। यहां कापालिक और नकुलीस आदि शैव मतों का प्रादुर्भाव हुआ। यहां से ही यह परंपरा पूरे देश में फैली। यही वजह है कि यहां के क्षेत्रों में पाए जाने वाले ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों और पुरातात्विक महत्व की इमारतों में शिव से जुड़ी प्रतिमाएं बड़े स्तर पर पाई जाती हैं।

यह बात आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के उप अधीक्षण डॉ. राजेंद्र यादव ने कही। वह जीवाजी यूनिवर्सिटी में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला में आयोजित एमबी गर्दे स्मृति व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारे यहां की सभ्यता का पता कायथा संस्कृति से चला। यह हड़प्पा के समकालीन सभ्यता है। जो 2500 बीसी के आसपास की है। यह ग्रामीण सभ्यता थी, जबकि हड़प्पा की सभ्यता नगरीय सभ्यता के रूप में जानी जाती है। उसके बाद 2000-1700 बीसी के आसपास आहाड़ संस्कृति के लोगों का जुड़ाव यहां से हुआ। इसके बाद जारवा संस्कृति और मालवा की संस्कृति भी प्रसिद्ध रही। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. एके सिंह एवं डॉ. शांतिदेव सिसौदिया मौजूद रहे।

संस्कृतियों का हुआ विस्तार

उन्होंने कहा कि नव पाषाण काल में उत्तर भारत में वर्तमान समय में नीमच, महेश्वर और उज्जैन का हिस्सा ज्यादा उपयोगी था। यहां पर मानव रहन-सहन के लिए अनुकूल वातावरण था। हजारों साल बाद जब पर्यावरण परिवर्तन हुआ, तो इसका विस्तार आगे जाकर विदिशा, होशंगाबाद तक हो गया।

डॉ. राजेंद्र यादव

जीवाजी यूनिवर्सिटी में आयोजित एमबी गर्दे स्मृति व्याख्यानमाला में शामिल प्रतिभागी व छात्र-छात्राएं।

रिसर्च स्कॉलर्स ने पूछे ये सवाल

 मूर्ति परंपरा में आदर्श क्या है?

- जब किसी परंपरा, नियम और भारतीय प्रतिमानों के आधार पर मूर्तिशिल्प बनाए जाते हैं, तो वह आदर्श कहलाते हैं। इसमें शिल्प शास्त्र के अनुरूप मूल देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं। इसमें यह पता चल जाता है कि राम और हनुमान जैसे मूल देवताओं की मूर्तियां में कितने ताल का प्रयोग किया गया है।

 खुदाई में मिली देवी-देवताओं की मूर्तियों को कैसे पहचाना जाता हैै?

- खुदाई में किसी देवता की मूर्ति प्राप्त होती है। यदि वह किसी दीवार के सहारे या वेदिका पर बनी होगी, तो वह किसी मूल देवी-देवता की होगी। पार्श्व देवी-देवताओं की मूर्तियों को पहचानना आसान है। इसमें कोई भी रचनात्मकता दिखाई जा सकती है। जैसे- शिव परिवार में शिवलिंग मूल देवता और उनका परिवार पार्श्व देवताओं का अच्छा उदाहरण हैं।

 कला को आप किस तरह देखते हैंै?

- कला रचनात्मकता को दर्शाती है। जब हम किसी मूर्ति को देखते हैं और उसमें यदि ब्यूटी के साथ इमोशन पावर है, तो वह मूर्ति निश्चित ही लोगों के स्मृति पटल पर अंकित हो जाती है। जबकि अन्य मूर्तियां नहीं हो पातीं, यह भी कला का एक रूप है।

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