मेरी शान तिरंगा **

Gwalior News - आज 70वां गणतंत्र दिवस मना रहे हमारे देशवासी देशप्रेम की भावना से सराबोर है। अपनी देशभक्ति की इस फीलिंग्स को गहराई...

Jan 26, 2020, 07:16 AM IST
आज 70वां गणतंत्र दिवस मना रहे हमारे देशवासी देशप्रेम की भावना से सराबोर है। अपनी देशभक्ति की इस फीलिंग्स को गहराई से जताने के लिए हर आयोजन, घर में हमेशा से ही देशभक्ति दर्शाने वाले बॉलीवुड गीत बजाए जाते रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि हर राष्ट्रीय पर्व पर गूंजने वाले इन तरानों के रचे जाने के पीछे भी एक कहानी छुपी हाेती है। आज जानिए बॉलीवुड के पेट्रियोटिक सॉन्ग्स के रचे जाने की कहानी इन्हें बनाने वाले फनकारों की ही जुबानी:

पापा की खराब तबियत उसके डिप्रेशन की वजह नहीं हो सकती

अरु के वर्मा , को-स्टार

तकरीबन दस दिन पहले ही मैं सेजल से मिला था। खूब सारी बातें की थीं। एक बार भी ऐसा नहीं लगा था की वो परेशान है। रही बात उनके पापा के तबियत की तो वह काफी समय से खराब है। सेजल उसे बहुत ही बहादुरी से टैकल कर रही थी। पापा की तबियत उसके डिप्रेशन की वजह नहीं हो सकती। कोई और ही वजह है जो शायद किसी को ना पता हो।

डिप्रेशन के मामले में भारत अब दुनिया का कैपिटल बन गया है

डॉ. युसूफ माचिसवाला, साइकेट्रिस्ट

"डिप्रेशन के मामले में भारत अब दुनिया का कैपिटल बन गया है। मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन मेरे पास कई सेलेब्रिटीज आते हैं जो डिप्रेशन का शिकार होते हैं। डिप्रेशन का इलाज सही वक्त पर करना बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं कि ये सिर्फ ग्लैमर फील्ड में होता हैं या किसी स्पेसिफिक उम्र में होता है। आजकल तो छोटे बच्चे भी डिप्रेशन में हैं।'

यकीन नहीं हो रहा है कि वो अब हमारे बीच नहीं है

जैस्मिन भसीन, को-स्टार

"मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि सेजल ने आत्महत्या की। मैंने उसके साथ काम किया है और कभी ऐसा नहीं लगा की वह डिप्रेस्ड थी। वो लड़की काफी पॉजिटिव थी और सेट पर हमेशा एनर्जी से भरी हुई रहती थी। काफी चंचल और हंसमुख स्वभाव की थी और साथ ही बहुत अच्छी डांसर भी। भगवन उनकी आत्मा को शान्ति दे।'

मेरी आन तिरंगा’(फ़िल्म: तिरंगा)

जब ‘तिरंगा’ फिल्म के गाने के राइटर के लिए मुझे संगीतकार लक्ष्मीकांत जी ने सलाह दी- ‘मेहुलभाई! एक पुराने राइटर हैं- संतोष आनंद, जिन्होंने मनोज कुमार के साथ कई फिल्मों में गाने लिखे हैं। लेकिन अब लिखना छोड़ दिया है। उन्हें बुलाते हैं। संतोष जी को फोन किया तो उन्होंने कहा कि मैंने गाना लिखना छोड़ दिया है। पर जब उन्होंने आर्टिस्ट राजकुमार और नाना पाटेकर का नाम सुना तो तैयार हो गए। उन्होंने कहा- मैं सिर्फ छह-आठ दिन एक साथ मुंबई रुकूंगा और गाना लिखकर वापस चला जाऊंगा। आप मेरे रहने और टिकट का बंदोबस्त कर दीजिए। लक्ष्मीजी बोले- टिकट भेज दो, वे रेडी हो गए, यही बहुत बड़ी बात है। बहरहाल, वे जैसे-तैसे मुंबई आए और 8-10 दिन होटल में ठहरे और मात्र 8-10 दिन में ही उन्होंने ‘तिरंगा’ िफल्म के पांचों गाने लिख डाले। उन्होंने कहा- मेहुल जी यह मेरी लाइफ की लास्ट फिल्म है। इसे लोग याद करेंगे और यही हुआ। आज यह इतना एवरग्रीन है कि ‘मेरी आन तिरंगा है, मेरी जान तिरंगा है, मेरी शान तिरंगा है...’ हर जगह बजता है।


‘तेरी मिट्टी में मिल जावां’ (फ़िल्म: केसरी)

केसरी के प्रोड्यूसर करण जौहर को इस फ़िल्म की रिलीज के एक साल पहले मेरा लिखा और कंपोज किया एक गाना बहुत पसंद आया था। वो गाना फ़िल्म के बीच में था। जब फ़िल्म एडिट हो रही थी तब डायरेक्टर अनुराग सिंह ने कहा कि ये कंपोजिशन फिल्म के मध्य में होने के बजाय अंत में होना चाहिए। इसे सिचुएशनल होने की बजाय मैसेज देने वाला सॉन्ग होना चाहिए। तब मैंने अपने दोस्त मनोज मुंतशिर को फोन किया। वह उस पर काम करने लगे। एक दिन मनोज ने लंदन से फोन करके मुझे इसकी लाइनें सुनाईं तो मैंने स्पष्ट महसूस किया कि वह रो रहे थे। मुझे याद है कि उनके लिखे इमोशनल लिरिक्स जब पूरी टीम ने साथ बैठकर सुने तो हम सब रो रहे थे। अक्षय कुमार, करण जौहर सभी की आंखों में आंसू थे। इसमें सच में सभी की मेहनत नजर आती है। पहले इस गाने को कई बड़े गायकों ने गाया, लेकिन जब हमने बी प्राक से इसे गवाया तो इस गाने के इमोशंस उभर कर सामने आए।


मे रा बचपन पाकिस्तान में ही बीता है। वहां के तीस हजारी हॉस्पिटल में मेरा भाई पैदा हुआ था। उस वक्त भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था तो दंगों का माहौल बना हुआ था। जब कभी हॉस्पिटल में दंगाई आते थे तो एक सायरन बजता था। उसे सुनकर हॉस्पिटल के डॉक्टर, नर्स सब नीचे जाकर छिप जाया करते थे। उस हॉस्पिटल में मेरी मां एडमिट थी और भाई बीमार था। दोनों का इलाज चल रहा था। ऐसे ही एक दिन दंगाइयों के आने की खबर फैली, सायरन बजा और सारे डॉक्टर नर्स भीतर चले गए। इसी दौरान मेरे भाई की सांस उखड़ गई। मेरी मां चिल्लाती रही, डॉक्टर या नर्स को बुलाओ पर कोई नहीं आया। मेरा भाई चल बसा। उस वक्त मैं गुस्से से लाल पीला हो गया। मैं लंबा चौड़ा तो था ही। पास में पड़ा लट्ठ उठाया और डॉक्टर और नर्सों को पीटने लगा। बाद में मां को पता चला तो वह मुझ पर नाराज हुईं। उन्होंने कहा कभी हिंसा का सहारा मत लेना। मां की उस सीख का मैंने ताउम्र अपनी जिंदगी में अमल किया। कभी किसी से भी फिल्म इंडस्ट्री में नाराज हुआ तो हाथ नहीं उठाया। अपनी फिल्मों में भी अहिंसा के इसी सिद्धांत को उभारा।

जवानी में मेरी सोच व एप्रोच गढ़ने में मेरे पिताजी का बड़ा योगदान था। मैं पुरानी दिल्ली की क्रिकेट टीम का कैप्टन था। हॉकी भी खेला करता था। पिताजी कभी इन सब चीजों के लिए मना नहीं करते थे, पर बस एक ही चीज कहा करते थे कि बेटा अंधेरा होने से पहले आ जाया करो या पहले से ही बता दिया करो, कि कहां हो? वक्त गुजरता गया और मैं बड़ा हो गया। मेरी फूफी के बेटे लेखराज भाखरी मुंबई में राइटर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर थे। अपने प्रिय मित्र कुलदीप सहगल जी के साथ। मैं उन सब से मुंबई में आठ साल के बाद मिल रहा था। देखते ही उन्होंने कहा कि तुम्हें तो फिल्म लाइन में होना चाहिए। मैंने भी कह दिया, ठीक है भाई साहब और इस तरह से फिल्मों में मेरी एंट्री हो गई। पहला मौका उन्होंने दिया, हालांकि उसके बाद भी संघर्ष चलता रहा। दरअसल मैं मुंबई आया तो एक्टर बनने था, मगर लिखने-पढ़ने का मुझे बहुत शौक था। मुंबई आने से पहले अपने दिल्ली प्रवास के दौरान मैं नई सड़क जाया करता था। वहां पत्रिकाएं मिला करती थीं। मैं वो पत्रिकाएं खरीदा करता था, क्योंकि उसमें क्रांतिकारियों की वीरता की कहानियां हुआ करती थीं। खासकर भगत सिंह के बारे में। भगत सिंह जी से जुड़ाव की एक और वजह यह थी कि एक बार नाटक करने का मौका मिला था, मगर उसमें मैं भगत सिंह ठीक से प्ले नहीं कर पाया था। उस पर पिताजी ने तंज कसा था कि मैं तो ठीक से भगत सिंह का रोल भी नहीं प्ले कर पाया था। तो मैंने बहुत पहले से ही भगत सिंह के बारे में लिखना और रिसर्च करना शुरू कर दिया था उस जमाने में अखबारों की कटिंग निकालकर मैंने पता किया था कि भगत सिंह पर कौन सी धाराएं लगीं। उनके खिलाफ क्या दलीलें दी गईं तो इस तरह से मेरे पास रिसर्च मटेरियल काफी ज्यादा उनको लेकर आ गया था। दिल्ली में तो मैं लिखता था ही जब मुंबई आ गया तो वहां भी मैं उनके बारे में लिखता ही रहता था। मेरे चाचा मुझसे पूछा भी करते थे कि मैं मुंबई एक्टर बनने आया हूं या राइटर। मैं तब तक भगत सिंह पर काफी लिख चुका था। उस वक्त तक मेरी कुछ फिल्में हिट भी हो गई थीं। उन्हीं दिनों मेरे परम मित्र पी कश्यप ने भी ख्वाहिश जताई कि वे प्रोडक्शन में उतरने की प्लानिंग कर रहे हैं। मैंने भी उनसे कहा ठीक है करते हैं। साधना जी से, आशा जी से बात करते हैं और कोई एक कहानी लिखते हैं। उस पर कश्यप जी ने कहा कि, नहीं फिल्म तो मैं उसी कहानी पर बनाऊंगा जो तूने बताई थी यानी भगत सिंह जी के ऊपर।

मैंने उन्हें कहा कि भगत सिंह पर दो फिल्में पहले ही बन चुकी हैं और वह चली नहीं हैं। उसके बावजूद हम लोगों ने ‘शहीद’ शुरू की। फिल्म का पहला शॉट शुरू होने को था और मैं मेकअप रूम में दाढ़ी लगा रहा था। सीताराम शर्मा ने मुझसे ही पूछना शुरू कर दिया कि भाई क्या करना है? कैसे करना है? इस पर मैंने कहा-मुझे क्या पता? ऐसी स्थिति देखकर तो फिर हमने कहा कि यार अभी शूटिंग कैंसल करो, डायरेक्टर ढूंढो। वहां मौजूद लोगों ने कहा कि यार किसी तरह से तो फिल्म के लिए पैसे जुटाए हैं। आज का दिन तू किसी तरह से संभाल ले फिर देखते हैं। तो शूट के पहले दिन ही मेरे सिर पर डायरेक्शन का जिम्मा आ गया। तो सरदार भगत सिंह की वह फिल्म मुझे डायरेक्ट करनी पड़ गई। मुझे तब तक घड़ी बांधने का बहुत शौक था। पर उस फिल्म के बाद घड़ी बांधना छोड़ दिया, क्योंकि घड़ी और समय का फिल्म मेकिंग में कोई लेन-देन नहीं।

देशप्रेम की फिल्में बनाना मेरे प्रारब्ध में ही था

हमारी उस फिल्म शहीद ने ही आगे की बुलंद इमारत तैयार की। उसके प्रीमियर पर लाल बहादुर शास्त्री आए। उन्होंने बड़ी तालियां बजाईं। स्टेज पर आकर भाषण भी दिया। बड़ा आशीर्वाद दिया। रात को 2 बजे मेरे पास फोन आया कि शास्त्री जी ने मुझे और मेरे साथियों को चाय पर बुलाया है। सुबह चाय पर शास्त्री जी ने कहा कि- हमारी इस फिल्म शहीद को देखकर वह रात भर सो नहीं पाए हैं। वह मुझे भूतकाल में ले गए। उन्होंने बताया कि उन्होंने नारा दिया है ‘जय जवान जय किसान’ क्या उस नारे पर हम लोग फिल्म बना सकते हैंै? मैंने उनके पांव छुए और कहा कि आपने साेचा है तो जरूर बनेगी।’ उनका आशीर्वाद लेकर मैंने अपने परम मित्र केवल से कहा कि मुझे एक डायरी दे दो और दो चार बॉल पेन दे दो। मैं डीलक्स ट्रेन में दिल्ली से बैठा। गाड़ी फरीदाबाद से निकली। सर्दियों के दिन थे। गेहूं की लाइनें लगी हुई थीं। हरे-हरे खेत नजर आ रही थी। पहली लाइन मैंने लिखी, ‘यह धरती ऐसी हथेली है, जिस पर किसान हल चलाकर इंसान की तकदीर लिखता है। मैं सारी रात सोया नहीं, मुंबई पहुंचने तक ‘उपकार’ की कहानी लिख चुका था। बाकी 5-7 दिन लगे स्क्रीनप्ले डायलॉग लिखने में। इस तरह की देशप्रेम से लबालब फिल्म बनाना मेरे प्रारब्ध में ही था। यहां डायरेक्टर बनने नहीं आया था। यह सब कुछ प्रभु की इच्छा थी। ‘उपकार’ 50-60 लाख रुपए में बन गई थी। ‘शहीद’ भी करीबन 9 लाख रुपए में बनी थी।

फिर ‘उपकार’ का प्रीमियर हुआ। पहली बार राष्ट्रपति जाकिर हुसैन राष्ट्रपति भवन से बाहर निकलकर प्रीमियर पर आए। मेरे सारे दोस्तों ने मना किया था कि हर कोई राज कपूर नहीं बन जाता, इसलिए एक्टिंग से डायरेक्शन में मत आओ। प्रेमनाथ जी भी डायरेक्शन में आए थे, लेकिन नहीं चल पाए थे। तू भी डायरेक्शन में तो मत आ। उस पर मैंने उनसे कहा कि मैं तो फिल्म इंडस्ट्री में बाबूजी के पांव छूकर के आया था। मेरी फिल्मों में काम करने की जो मूल वजह थी, वह पूरी हो गई है। मुझे ₹3 लाख रुपए कमाने थे, जिनसे मैं अपने परिवार की जरूरत को पूरा कर सकूं। वह मैंने कर लिया है। अब मुझे फिल्मों से किसी और कमाई की इच्छा नहीं है। उस पर लोगों ने मुझसे यह भी कहा कि ‘कसमे वादे प्यार वफ़ा सब...’ जैसा गाना प्राण जैसे प्रचलित खलनायक से गवाओगे। पागल हो गए हो क्या? मैंने कहा पागल ही समझो पर यह गाना तो प्राण ही गाएंगे।

रहा सवाल मेरी एक और पेट्रियोटिक फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ का तो उसका कॉन्सेप्ट मेरे जहन में ऐसे आया था कि जब बंटवारे के बाद हम लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए थे तो मैं लाहौर मिस करता था। जहां मेरी पैदाइश थी, यानी ऐबटाबाद को मिस करता था। फिर जब काम के सिलसिले में दिल्ली से मुंबई आया तो दिल्ली की गलियों को मिस करता था। इस तरह मैंने सोचा कि जो लोग जरूरी काम से और रोजी-रोटी को अपने मुल्क को छोड़कर बाहर के देशों में रहते हैं, वह अपना वतन कितना याद करते होंगे। इस कॉन्सेप्ट को मैंने डवलप कर ‘पूरब और पश्चिम’ बनाई।

(जैसा कि अमित कर्ण को बताया)

‘भारत हमको जान से प्यारा है’(फ़िल्म: रोजा)

‘चक दे इंडिया’(फ़िल्म: चक दे
इंडिया)


‘मंगल... मंगल...’(फ़िल्म: मंगल पांडे)

‘मैं लड़ जाना, मैं लड़ जाना, है लहू में इक चिंगारी...’ (फ़िल्म: उरी )

वरुण धवन और श्रद्धा कपूर स्टारर "स्ट्रीट डांसर 3डी' ने पहले दिन घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 10.26 करोड़ रुपए कमाए। वहीं, कंगना रनोट अभिनीत "पंगा' 2.77 करोड़ पर ही सिमट गई। ट्रेड एनालिस्ट तरन आदर्श के मुताबिक, रेमो डीसूजा के निर्देशन में बनी "स्ट्रीट डांसर' की आेपनिंग इससे भी ज्यादा कलेक्शन के साथ होनी चाहिए थी। क्योंकि यह यूथ सेंट्रिक फिल्म है और इस तरह की फिल्मों की ओपनिंग सामान्यतः बड़ी होती है। वहीं "पंगा' ने शुक्रवार शाम के शोज से रफ्तार पकड़ी इसके बावजूद फिल्म बड़ी ओपनिंग हासिल नहीं कर सकी।

उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई शुरुआत

फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर और मल्टीप्लेक्स मालिक राज बंसल कहते हैं, "दोनों फिल्मों को उम्मीद के मुताबिक शुरुआत नहीं मिली। "पंगा' की तारीफ हुई है लेकिन कलेक्शन नहीं है। वहीं "स्ट्रीट डांसर' के कलेक्शन में बहुत ज्यादा बढ़त होती नहीं दिख रही है।'

ग्वालियर, रविवार, 26 जनवरी 2020 . 06

‘शहीद’ देख शास्त्री जी बोले मेरे नारे-‘जय जवान...’ पर फिल्म बना सकते हैं क्या?**

देशप्रेम की फिल्में बनाने का जुनून कैसे आया, यह खुद बयां कर रहे हैं मनोज कुमार...**

भास्कर कॉन्सेप्ट **

(मनोज कुमार, अभिनेता व निर्देशक)

1965 में फिल्म ‘शहीद’ के प्रीमियर पर तत्कालीन पीएम लाल बहादुर शास्त्री के साथ मनोज कुमार और फिल्म की कास्ट। (फाइल फोटो)

एक ही महीने में दो टीवी एक्टर्स ने की सुसाइड, पिछले साल दिसंबर में कुशल पंजाबी ने दी थी जान

अब "दिल तो हैप्पी है जी' फेम टीवी एक्ट्रेस सेजल शर्मा ने की आत्महत्या**

मुंबई स्थित अपने घर पर लगाई फांसी...
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सेजल मीरा रोड स्थित रॉयल नेस्ट बिल्डिंग में रहती थीं। उन्होंने आमिर खान, रोहित शर्मा और हार्दिक पांड्या के साथ एड में काम किया। "आजाद परिंदे' नाम की वेब सीरीज में भी वह नजर आईं थीं। टीवी सीरियल की दुनिया में उन्हें पहला ब्रेक "दिल तो हैप्पी है जी' में मिला। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- मिडिकल क्लास फैमिली से होने की वजह से उन्हें परिवार को एक्टिंग में कॅरिअर बनाने के लिए मनाना मुश्किल था। वह शो का हिस्सा बनकर काफी खुश थीं।

बताया जाता है कि सेजल अपनी निजी जिंदगी में काफी परेशान चल रहीं थीं। गुरुवार देर रात उन्होंने अपने दोस्तों से फोन पर लंबी बातें कीं। सुसाइड नोट में भी उन्होंने अपनी मौत की वजह निजी बताया है।

टी वी शो "दिल तो हैप्पी है जी' फेम टीवी एक्ट्रेस सेजल शर्मा ने शुक्रवार को मुंबई में अपने मीरा रोड स्थित आवास पर आत्महत्या कर ली। उनका शव पंखे से ओढ़नी के सहारे फांसी के फंदे पर लटका मिला। मूल रूप से उदयपुर (राजस्थान) की रहने वालीं सेजल माता-पिता की इच्छा के विपरीत 2017 में मुंबई आईं थी। सुसाइड नोट में उन्होंने आत्महत्या की वजह डिप्रेशन बताया है।

भास्कर विशेष **

इस गाने को गाते समय मेरे जेहन में एक कहानी थी, जिससे मेरे अंदर से आवाज आई ‘चक दे इंडिया’। ब्रिटिश भारत की फौज में ध्यानचंद और सरदारा सिंह नाम के दो भाई थे। दोनों हॉकी खिलाड़ी थे। इन्होंने ब्रिटेन में इंग्लैंड और इंडिया के मैच में खुद पर राज करने वाले मुल्क पर दनादन गोल बरसाए। जीतने के बाद हिटलर ने दोनों को बुलाया और अपनी आर्मी में सबसे बड़ी पोस्ट ऑफर की। उन्होंने जवाब दिया, हम हमारा भारत नहीं छोड़ सकते। उनके इस वतनप्रेम ने मेरे अंदर जज्बा जगाया ‘चक दे इंडिया’।

‘मंगल पांडे’ फिल्म पर काम करते हुए ए.आर रहमान साहब ने मुझसे कहा- आप कोई ऐसा गाना सुना सकते हैं कि जोर रोम-रोम को उत्साहित कर दे। मैंने आल्हा-ऊदल सुना दिया, तो उस पर उनका कोई रिएक्शन नहीं आया, बस अंदर चले गए। मुझे लगा कि अभी वह थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे। वहां मैं एक घंटा इंतजार करता रहा। जब मुझे अंदर बुलाया तो क्या देखा कि जितनी देर हमने इंतजार किया, उतनी देर में वह टाइटल ट्रैक का म्यूजिक तैयार कर चुके थे। फिर वहीं जावेद अख्तर जी के अपने बोल दिए थे और मैंने इसे गाया।

और सचदेव ने हमसे ऐसे तीन चार गाने लिखवाए थे। हमें कई बार डायरेक्टर के पॉइंट ऑफ व्यू से चलना पड़ता है क्यूंकि वो स्क्रिप्ट के अंदर होता है और हम स्क्रिप्ट के बाहर होते हैं। तो प्रैक्टिकल न होते हुए भी ऐसे गाने मैंने इसमें लिख डाले। चूंकि इनमें जज्बा और जोश जबरदस्त था तो ये सुनने वालों के फेवरेट बन गए। इनको सुनते ही हर इंडियन के अंदर एक ऑटो प्राउड आ जाता है। इस गाने में बनते समय चेंजेज तो काफी आए। धुन और लिरिक्स फाइनल थे, मगर बनते-बनते इसने अलग रूप ले लिया। ‘है लहू में इक चिंगारी’ वाली लाइन के साथ इस गाने में एक जज्बा डालना सीधे-सीधे डायरेक्टर का व्यू था । जब उरी को और इस गाने को ढेरों प्रशंसा के साथ कई अवॉर्ड मिले तो हमें इस पर बहुत प्राउड हुआ।

गाना लिखना वैसे भी हमारी टीम के लिए एक युद्ध की तरह होता है और उरी के इस गाने को तो हमने वॉर फीलिंग के साथ ही लिखा। जिस जोश को दर्शाने वाला गाना ‘मैं लड़ जाना, मैं लड़ जाना’ है, ऐसे गाने बहुत कम बनते हैं। जब इस गाने को सुनते हैं तो देशभक्ति की ऐसी भावना अंदर से आती है कि अब रुकना नहीं है, लड़ जाना है, मर जाना है। इस गाने के अंतरे में कुछ लाइनें हैं, ‘ये दिल की मशालें/ जोश से जलाके/ जलती लपटों को है/ हमने हाथों में थाम लिया...।’ ऐसी लाइनें जो प्रैक्टिकल नहीं हाेती, उन्हें सामान्यत: मैं यूज़ नहीं करता, मगर इस बार डायरेक्टर आदित्य धर को कुछ ऐसा ही चाहिए था, तो उनके कहने पर मैंने इन्हें लिख दिया। आदित्य

‘तेरी मिट्टी...’ गाने के पीछे की एक रोचक बात किसी को नहीं पता। इसकी जो ट्यून व कंपोजीशन है, वह दरअसल देशभक्ति गाने की नहीं, बल्कि रोमांटिक गाने की थी और उस पर पहले रोमांटिक गाना लिखा भी गया था। संगीत निर्देशक आरको ने एक रोमांटिक गाने की धुन बनाई थी। फिल्म के डायरेक्टर अनुराग सिंह और करण जौहर ने आईडिया दिया कि क्यों न फिल्म का आखिरी गाना इस रोमांटिक धुन पर किया जाए। इस तरह रोमांटिक धुन पर तेरी मिट्टी... गाना लिखा गया। संदेशे आते हैं... के बाद देशप्रेम का इतना हिट कोई गाना हुआ ही नहीं। इस गाने के लिए मैंने इस सिचुएशन को अपने अंदर जज किया, कि जब कोई सिपाही सीने पर गोली खाकर देश के लिए मर रहा होता है तब आखिरी के 10 मिनट उसके मन में चलता क्या है। मैंने उसे शब्दों में भी क्रिएट करने की कोशिश की। एक रोचक बात और कि यह गाना फिल्म में सिर्फ डेढ़ मिनट का ही था, लेकिन जब करण जौहर और अनुराग ने इतनी लाइनें सुनी, तब उनके मन में एक लालच आ गया कि यह गाना तो बहुत अच्छा बन रहा है, तो इसे और लंबा क्यों न किया जाए। फिर तो यह 6 मिनट का गाना बना।

जब आप अपने देश भारत के लिए कोई गीत गाते हंै, तो जो देशभक्ति की हिलोेरें आपके दिल में उठ रही होती हैं वो अपने आप आपके शब्दों व गीत की पंक्तियांे में उतर आती हैं। ऐसा ही कुछ रोजा फिल्म के गीत ‘भारत हमको जान से प्यारा है’ के साथ हुआ। इस गीत को गाने के दौरान की यादें मेरे दिल में आज भी ताजा हैं। जब मैं इसे गा रहा था तो ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं कोई लोरी गा रहा हूं। जब आप ओरिजनल गाना सुनेंगे तो बिल्कुल वही ममता झलकेगी जो बच्चे को सुला रही मां की लोरी में दिखती है। जब मैं यह गाना गा रहा था तो मेरे जेहन में मां का अख्स उभर रहा था। जैसे आप मां को देखते हैं, उनसे बात करते हैं, तो उनके प्रति आपके मन में असीम प्यार आ जाता है। ठीक उसी तरह से हमारी भारत भूमि है, जिसे हम मां के रूप में देखते हैं। इसी भारत मां का रूप उभर रहा था, मेरे जेहन में। तभी तो शब्दों में इतनी गहराई आ सकी है। सबसे अच्छी बात है कि इसके संगीतकार एआर रहमान साहब ने भी इसके सुर भी मेरी भावना के अनुरूप ही लगाए थे। इस गाने की टयून और लफ्ज भी खूबसूरत थे तो एक देशभक्ति की फीलिंग जाग उठी और ये सब मिलकर ऐसा गाना बन गया कि वह हर किसी की जुबान पर चढ़ गया।


मन में भारत मां की छवि और सीने में मर मिटने के जज्बात बसाकर रचे गए देशप्रेम के सुपरहिट गीत
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बॉलीवुड के पेट्रियोटिक सॉन्ग्स के रचे जाने की कहानी सुनिए इन्हें रचने वाले फनकारों की ही जुबानी
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मेहुल कुमार

(इस फिल्म के डायरेक्टर)

सुखविंदर

(गाने के गायक)

कैलाश खेर

(गाने के गायक)

आरको

(तेरी मिट्टी गाने के संगीतकार)

कुमार

(गाने के राइटर)

मनोज मुंतशिर

(‘तेरी मिट्टी’के लिरिसिस्ट; बता रहे हैं िकस फीलिंग से लिखा इसे)

हरिहरन

(इस गाने के गायक)

‘जर्सी’ के सेट पर लौटे शाहिद**

शाहिद कपूर हाल ही में फिल्म ‘जर्सी’ की शूटिंग के दौरान घायल हो गए थे। इस दौरान उनके होठों पर चोट आई थी और बाद में टांके लगाने पड़े। हालांकि अब वह ठीक हैं और उन्होंने फिर से चंडीगढ़ में फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी है। इस बारे में फिल्म के प्रोड्यूसर अमन गिल कहते हैं, ‘शाहिद एक बहुत ही प्रोफेशनल एक्टर हैं और वे बिल्कुल भी समय बर्बाद नहीं करते। उन्होंने बेहतरीन ट्रीटमेंट लिया और बिना किसी देरी के सेट पर वापस लौट आए हैं। उनकी एनर्जी और डेडीकेशन तारीफ के काबिल है।’


dedication...

पहले दिन "स्ट्रीट डांसर' पड़ी "पंगा' पर भारी**

box office report...

Glamour

Kangana Ranaut

Himesh Reshammiya

Hina Khan

Alaya

Photos :

Ajit Redekar

Dhvani Bhanushali

Varun

Dhawan

& Shraddha Kapoor

Disha Patani

with Aditya Roy Kapoor

गणतंत्र दिवस के अवसर पर अपना राष्ट्रप्रेम दर्शाते हुए कई बाॅलीवुड सेलेब्स ने दैनिक भास्कर के लिए तिरंगे के साथ स्पेशल फोटोशूट करवाए। देखें तस्वीरें...

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