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धीरे यदि हो गए चलते-चलते कदम मंजिलों तक तुम नहीं...

एक वर्ष पहले
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मैं नहीं समझ पाया नजरों की शरारत को, आसान नहीं पढ़ना चेहरे की इबारत को। यह पंक्तियां डॉ. राकेश राज ने काव्य गोष्ठी में पढ़ीं। संगम साहित्य संस्था की ओर से शुक्रवार को मानस भवन में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता चेतराम सिंह भदौरिया ने की। संचालन कादंबरी आर्य ने किया। इस अवसर पर अमर सिंह यादव, प्रेम नारायण सिंह, पं. अशोक शर्मा मस्तराज, राजकिशोर वाजपेयी, रमेश निर्झर, अमिता गुप्ता मौजूद रहीं।

जुगाड़ों से तो धन आया बहुत है, वो कहते ही नहीं खाया बहुत है, हमारे घर में रोटी के हैं लाले, मगर उनके यहां माया बहुत है। - अमित चितवन

मेरा मन प्यासा है धरती की तरह मेघ बनके छा जाओ, जाने कितने बरस से प्यासी हूं, प्यास मेरी बुझा जाओ।

- रेखा दीक्षित

वो मजहब का जुनून हद, शोर, शराबा सड़क पे देखिए, फिल्मी हंसी अंदाज जिस्म है उघारा सड़क पे देखिए।

- गंगादीन शाक्य

टेड़े मेढ़े हैं रास्ते जहां के सुनो तेज दौड़ोगे यदि साफ गिर जाओगे, धीरे यदि हो गए चलते-चलते कदम मंजिलों तक नहीं तुम पहुंच पाओगे।

- चेतराम सिंह भदौरिया

दीदार को भी उनके तलबगार हो गए हैं, हम इस कदर खुदा के गुनाहगार हो गए हैं, खुद से भी ज्यादा उनको हमने चाह लिया है, बस इतनी सी बात पर वो मगरूर हो गए हैं। - निशा पाठक

काव्य गोष्ठी
सिटी रिपोर्टर . ग्वालियर

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