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घर के हालात नहीं थे अच्छे, बीच में छूट गई पढ़ाईखुद बनाई साइकल, युवाओं को कर रहे हैं अवेयर
awareness campaign
कबाड़ से डिजाइन की साइकल
अलताफ का कहना है कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए परिजन केवल 8वीं तक पढ़ाई करा सके, लेकिन विज्ञान और इंजीनियरिंग के प्रति रुचि उनकी निरंतर बनी रही। इसलिए उन्होंने मैग्जीन को निरंतर पढ़ना जारी रखा। जिसकी बदौलत 3 महीन में कबाड़ से साइकल तैयार की। इस साइकल में कार का हैंडल लगाया। साथ ही इसमें एक बैटरी भी लगाई है। साइकल चलाने पर यह बैटरी स्वत: ही चार्ज होती है।इसके अलावा रात में सफर के दौरान कोई परेशानी नहीं आए, इसलिए इसके हैंडल में लाइट लगाई गई हैं।
बुलाती है मगर जाने का...से बताते हैं नशे के दुष्परिणाम
साइकल के साथ अलताफ।
युवाओं को नशे के दुष्परिणाम के प्रति अवेयर कनरने के लिए उन्होंने युवाओं के प्रिय शायर राहत इंदौरी की गजल का भी प्रयोग खुद की तैयार साइकल पर किया है। साइकल के दोनों ओर से उनकी प्रचलित गजलों की पटि्टकाएं लगवाई हैं। इनमें \\\"बुलाती है मगर जाने का नहीं, ये दुनिया है इधर जाने का नहीं... \\\'शामिल हैं। इसके अलावा यात्रा के दौरान पोस्टर साथ रखते हैं।
अधिकांश युवा गलत संगत में पड़ने के कारण पढ़ाई बीच में छाेड़ देते हैं। कुछ युवा बोर्ड परीक्षा का तनाव नहीं ले पाते हैं। ऐसे युवाओं को जागरूक करने के लिए रामाजी का पुरा निवासी अलताफ खान जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इस अभियान के अंतर्गत वह खासतौर पर ग्वालियर के ग्रामीण क्षेत्रों में जाते हैं। इसकी वजह है कि हर साल ग्रामीण क्षेत्रों के युवा रोजगार की तलाश और गलत संगत में फंसने के कारण अपने कॅरियर की तबाह कर लेते हैं। दो साल पहले उसका दोस्त ने कक्षा 10वीं के पेपर बिगड़ने के कारण आत्महत्या कर ली थी। ऐसा गलत कदम कोई दूसरा नहीं उठाए, इसलिए वह हर सप्ताह अपनी कहानी सुनाते हैं। जिससे दूसरों को भी प्रेरणा मिले। अलताफ ने पढ़ाई घर की आर्थिक परिस्थितियों के कारण बीच में छोड़ दी थी, लेकिन इसके बाद भी किताब और मैग्जीन पढ़कर इंजीनियरिंग और साइंस की जानकारी ली।