शहरों में तो बारूदों का मौसम है, गांव चलो ये...

Gwalior News - सिटी रिपोर्टर . ग्वािलयर शेर-ओ-सुखन की महफिल अपने उरूज पर थी। मोहब्बत और अमन का पैगाम देती इबारत की महफिल में जब...

Oct 21, 2019, 07:26 AM IST
सिटी रिपोर्टर . ग्वािलयर

शेर-ओ-सुखन की महफिल अपने उरूज पर थी। मोहब्बत और अमन का पैगाम देती इबारत की महफिल में जब नामचीन शायर डॉ. राहत इंदौरी ने मंच संभाला तो युवाओं ने तालियों से उनका इस्तकबाल किया। अपने अंदाज में उन्होंने कहा कि ग्वालियर से मेरा दिल का रिश्ता है। यहां पढ़ने का मजा भी कुछ अलग है। अदब की महफिल को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने शेर कहा कि शहरों में तो बारूदों का मौसम है, गांव चलो ये अमरूदों का मौसम है। आगे कहा कि सितारे किस लिए जलभुन रहे हैं, कभी उसका तबस्सुम छू गया था, उजाले आज तक सिर धुन रहे हैं, साहब अभी मत छेड़िए जिक्र-ए-मोहब्बत, जलाउद्दीन अकबर सुन रहे हैं। इस मौके पर रमाशंकर सिंह, यूनिवर्सिटी की चांसलर रुचि सिंह चौहान, कुलपति डॉ. केके द्विवेदी सहित श्रोता मौजूद रहे।

बात करने का हंसी तौर तरीका सीखा। हमने उर्दू के बहाने से सलीका सीखा।

किसी के इश्क में बर्बाद होना, हमंे आया नहीं फरहाद होना। कोई तामिर की सूरत तो निकले।

- मनीष शुक्ला, लखनऊ

मेरी सांसो में समाया भी बहुत लगता है और वही शख्स पराया भी बहुत लगता है, उससे मिलने की तमन्ना भी बहुत है, लेकिन आने जाने में किराया भी बहुत लगता है। - डॉ. राहत इंदौरी

आने वालों के लिए महबे दुआ रहता हूं मैं,

मैं हूं दरवाजा मोहब्बत का खुला रहता हूं मैं। जिंदगी बे-सबब कुछ भी कभी होता है क्या, कोई चेहरा है तभी तो आइना रहता हूं मैं।

- मदन मोहन दानिश, ग्वालियर

जब उसकी तस्वीर बनाई जाती है, साया-साया धूप मिलाई जाती है, पहले उसकी आंखें सोची जाती हैं, फिर आंखों में रात बिताई जाती है। मुझे दरिया बनाना चाहती है, यह दुनिया डूब जाना चाहती है।

- असलम राशिद, गुना

जरूरत से ज्यादा मिल गई है, मोहब्बत बेइरादा मिल गई है,

मैं जितना जिंदगी को चाहता था, मुझे उससे ज्यादा मिल गई है।

वही जज्बे मोहब्बत कोई कहां से लाए, न वो चाहतों के मौसम न वो गेसुएं के साए।

-अज्म शािकरी, ऐटा

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