सद् भाव की मिसाल हैं शहर के ये तीन आयोजन

Gwalior News - ग्वालियर| शहर में हिंदू-मुस्लिम एकता और सौहार्द की मिसाल हैं कई आयोजन। लेकिन इन तीनों का खासा महत्व है। दशकों से इन...

Nov 10, 2019, 08:06 AM IST
ग्वालियर| शहर में हिंदू-मुस्लिम एकता और सौहार्द की मिसाल हैं कई आयोजन। लेकिन इन तीनों का खासा महत्व है। दशकों से इन आयोजनों में हिंदू-मुस्लिम बढ़-चढ़कर भागीदारी कर एकता का परिचय देते आ रहे हैं।

1. तानसेन महोत्सव

शहर में संगीत सम्राट तानसेन की याद में होने वाला वार्षिक समारोह शहर में सांप्रदायिक सद् भाव का प्रतीक है। तानसेन समारोह की शुरुआत ढोलीबुवा महाराज की हरिकथा से होती है। इसके बाद मुस्लिम गुुरु मीलाद पेश करते हैं। इसके बाद चादरपोशी होती है। चादरपोशी में हिंदू अौर मुस्लिम समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहते हैं। यहां पर तानसेन की समाधि है अौर उनके गुरु मोहम्मद गौस का मकबरा है।

3. मंसूर शाह की दरगाह का उर्स

गोरखी देवघर में स्थित मंसूर शाह साहब की दरगाह पर अयोजित होने वाला उर्स का शुभारंभ ढोली बुवा महाराज की हरिकथा से होता है। सिंधिया परिवार के मुखिया चादर पोशी करते हैं और आशीर्वाद स्वरूप उन्हें फूल मिलता है। इसके बाद लंगर आयोजित होता है। उर्स में हिंदू मुस्लिम संप्रदाय के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित होते हैं।

2. राजा बाक्षर मंदिर का उर्स

राजा बाक्षर मंदिर में अप्रैल के कृष्ण पक्ष की दशमी से 10 दिवसीय उर्स समारोह होता है। पहले दिन मुस्लिम तरीके से बाबा की इबादत होती है। शेष नौ दिन हिंदू पद्धति से पूजा पाठ होती है। पहले दिन नयाज, कुल का छींटा, गुस्ल, फकीरों का लंगर, कव्वाली के साथ चादरपोशी होती है। महंत तरुण सूर्यवंशी ने बताया, नौ दिनों में हिंदू पद्धति से पूजा होती है। सावन में राजा बाक्षर को बेल पत्री भी चढ़ाई जाती है।

इबादत के साथ मंदिर की सेवा और मरीजों के अटेंडेंट को खिला रहे खाना

अवाड़पुरा में रहने वाले खलील अहमद इबादत के साथ अस्पताल परिसर में आश्रय भवन के पास हनुमान मंदिर पर सेवा और भोग लगाकर मरीजों के अटेंडेंट को नियमित खाना खिलाते हैं। शनिवार काे राम जन्मभूमि काे लेकर फैसला आने के बाद भी उन्हाेंने मरीजाें की सेवा की। इबादत व पूजा में अंतर करने वालों के लिए खलील एक आदर्श हैं। खलील के साथ उनके भाई सगीर भी पूरा सहयोग करते हैं। जेएएच में सेवा भाव समिति द्वारा मरीजों के अटेंडेंट के लिए स्वलपाहार व भोजन वितरण में खलील अहमद अपने भाई सगीर के साथ व्यवस्था संभालते हैं। यहां मंदिर में हनुमान जी को भोग भी लगाते हैं। इस मंदिर में खलील ने 11 वर्ष पूर्व आना शुरू किया था। खलील कहते हैं मुझे यहां सेवा करने से सुकून मिलता है।

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