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संसार को कोई सुधार नहीं सका, हम सुधरेंगे ताे युग सुधरेगा : पं. तिवारी

एक वर्ष पहले
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श्रीसिद्ध गणेश मंदिर परिसर में श्रीमद् भागवत सत्संग सुनतीं महिलाएं।

हरदा| परमात्मा हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे। ईश्वर की न तो शुरुआत होती है और न ही अंत होता है। इसलिए ईश्वर को अनादि, अनंत कहते हैं। लोहे को आग में तपाने से वह लोहा नहीं रहता है अग्नि रूप हो जाता है। उसी प्रकार मूर्तियों में परमात्मा का प्रवेश होता है। यह बातें पं. भगवती प्रसाद तिवारी ने सिद्ध गणेश मंदिर परिसर में कथा के तीसरे दिन कही। उन्हाेंने कहा कि मंदिर में भी भावना रखना पड़ता है। मंदिर के बाहर निकलने के बाद जो कुछ दिखाई देता है उसमें भी भगवानजी की भावना रखना चाहिए। सृष्टि को सुधारना असंभव है। अपनी दृष्टि को सुधारो। इस संसार को कोई सुधार नहीं सका। हम सुधरेंगे ताे युग सुधरेगा। हम बदलेंगे ताे युग बदलेगा। किसी की देह को देखो तो उसमे आत्मदेव को भी देखो। जो देह को सुंदर समझता है वह ईश्वर से बहुत दूर है। देह में देव विराजित हैं। जब आत्मदेव बाहर निकल जाता तब घर में रखने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता। मानव शरीर में भगवान न हो तो बोलना, सुनना, चलना, खाना पीना कुछ भी नहीं कर सकता है। 100 रुपए का नोट देखने में एक कागज का टुकड़ा ही होता है, लेकिन बुद्धि कहती है कि वह कागज नहीं नोट रुपया है। कथा का समापन ध्रुवजी के वंश में अंग राजा के पुत्र वेन एवं पृथु महाराज के चरित्र, जड़भरत चरित्र, अजामिल और भक्त प्रहलादजी, भगवान नरसिंहजी की कथा व झांकी के साथ किया गया।
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