दाे समाज की हाेली से जुड़ी दाे परंपराएं
समाज की अापसी एक-जुटता से पर्व, 5 दिन तक चलता है रंग गुलाल
कोरकू समाज की होली को लेकर अनूठी परंपरा है। इस समाज-जनजाति के लोगों द्वारा दाे दिन तक हाेली जलाई जाती है। पहले दिन छाेटी होती है, दूसरे दिन बड़ी हाेली जलाई जाती है। रंग और गुलाल 5 दिन तक खेला जाता है।
पुरुष फगुनई गाते हैं। होली का डांडा जलते हुए जिस दिशा में
गिरता है, उससे वे बारिश व साल भर हाेने वाले शुभ अशुभ का अंदाजा लगाते हैं।
हाेली के लिए 15 दिन पहले से हर घर से 1-1 लकड़ी ली जाती है। इसे एका डेगा अर्थात एकजुट रहना कहते हैं। छोटी होली को सुइकू या सूखी होली कहते हैं। इसे गांव के पश्चिम की ओर रात 8-9 बजे जलाते हैं। पुरुष बैठकर फगनई गाते हैं। महिलाएं हाथ में मोर पंख, झाडू लेकर नाचती गाती हैं। अगले दिन सुबह 8-9 बजे बड़ी होली जलती है। इसे लेकर विशेष तैयारी की जाती है।
विश्नोई समाज के 363 महिला-पुरुषों ने पेड़ बचाने दे दी थी जान इसलिए समाज नहीं करता हाेलिका दहन
अाज सूतक दूर करने मंदिर व घराें में हाेगा हवन, बनेगा सादा खिचड़ा
महेश भवरे | हरदा
विश्नाेई समाज का पर्यावरण प्रेमी है। खेजड़ली के पेड़ बचाने 363 नर नारियों ने जान दी थी। इसी कारण अाज भी यह समाज हरे पेड़ व लकड़ी हाेली नहीं जलाता है। हाेलिका दहन हाेने पर सूतक मानते हैं। सुबह स्नान करते हैं। फिर हवन कर घर पवित्र करते हैं। जंभेश्वर मंदिर में भी सामूहिक हवन हाेता है। फिर प्रहलाद के सुरक्षित बचने की खुशी में गले मिलकर मिठाई बांटते हैं। इस दिन भाेजन में सादा खिचड़ा पकती है।
खास बात यह है जिस वक्त लोग होली मनाते हैं तब विश्नोई समाज के लोग मंदिर में सामूहिक हवन कर पाहल ग्रहण करते हैं। वेद विश्नोई ने बताया हाेली के नाम पर थाेक में लकड़ी जलाने काे वे नीति व पर्यावरण विरुद्ध मानते हैं। इस दिन पुराने गिले-शिकवे, मनमुटाव व सामाजिक समस्याएं सुलझाते हैं। हवन पाहल के बाद होली के दिन प्रहलाद-चरित्र सुनाया जाता है। पाहल ग्रहण कर ईश्वर से अपने से जाने-अंजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगते हैं।
काेरकू समाज की छाेटी होली अाज, कल बड़ी होली जलाएंगे, डांडा गिरने से लगाते हैं बारिश का अनुमान
दिशा के आधार पर लगाया जाता है अनुमान
कोरकू जनजाति पर शोध करने वाले डॉ. धर्मेंद्र पारे बताते हैं कि भाेमका होली पूजता है। फिर दो होली खड़ी की जाती हैं। आग लगाने के जलते डांडे की दिशा देखते हैं। इसका पूर्व उत्तर में गिरना शुभ व दक्षिण पश्चिम में अशुभ मानते हैं। जलती होली को पूर्व उत्तर की ओर भी धकेला जाता है। ग्राम प्रमुख नए मटके में होली की राख लेकर ऊपर से 7 बार मोड़ा हुआ सफेद कपड़ा बांधकर नदी में इसे उलटा डालते हैं। इनसे निकले बुलबुले देखते हैं। बुलबुले पूर्व-पश्चिम दिशा में शुभ, दक्षिण-उत्तर में अशुभ मानते हैं। होली से नए कपड़े पहनने की शुरुआत होती है।
बिना रंग गुलाल, मिठाई बांटकर मनाते है खुशी
पूनम पवार ने बताया होलिका दहन से पूर्व जब प्रहलाद को गोद में लेकर बैठती है, तभी से शोक शुरू हो जाता है। सुबह प्रहलाद के सुरक्षित लौटने पर यह समाज खुशी मनाता है, लेकिन किसी पर कीचड़, गोबर, रंग नहीं डालते हैं। वे बताते हैं कि प्रहलाद विष्णु भक्त थे। विश्नोई पंथ के प्रवर्तक भगवान जंभेश्वर विष्णु जी के अवतार थे। कलयुग में संवत 1542 कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को भगवान जंभेश्वर ने कलश की स्थापना कर पाहल पिलाकर विश्नोई पंथ बनाया था। जांभाणी साहित्य के अनुसार तब के प्रहलाद पंथ के अनुयायी ही आज का विश्नोई समाज है।
हरदा। जंभेश्वर मंदिर नीमगांव में हवन व कलश स्थापना। (फाइल फोटो)
हरदा। कोरकू समाज इस तरह जलाता है दो होली। (फाइल फोटो)