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गरीब बस्तियों में महिलाओं, युवतियाें और बच्चों को पढ़ाने शुरू की चलती-फिरती लाइब्रेरी

3 वर्ष पहले
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1981 में पिताजी का निधन हो गया। घर में सबसे छोटी होने के बावजूद परिवार में मुखिया की भूमिका निभाने का निर्णय लिया। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं से दोयम दर्जे का व्यवहार जगजाहिर था। ऐसे में मैंने प्राइवेट पढ़ाई कर ग्रेजुएशन व हिंदी में एम किया। पढ़ाई खर्च जुटाने के लिए प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हुए अध्ययन जारी रखा।परिवार की गुजर बसर के लिए नौकरी जरूरी थी। 1984 में सहायक शिक्षक बनीं। इसके बाद पूरा जीवन समाज की गरीब, अशिक्षित महिलाओं, युवतियां व बच्चों को शिक्षित करने में समर्पित कर दिया। ऊड़ा सरकारी स्कूल की सहायक अध्यापक सुश्री शोभा बाजपेयी ने।

पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन व जीवन में औरों के लिए कुछ करने की शुरू से ही ख्वाहिश थी। इस कारण विवाह नहीं किया। सुबह वे घर में पिता के रोल में होती है। स्कूल में शिक्षिका और शाम को गरीब बस्तियों में लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करती हैं। सुश्री बाजपेयी ने कहा ज्ञान व खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और अपने लिए जिए तो क्या जिए इसे जीवन के मूलमंत्र के रुप में अपनाया। बहनों व भाईयों के प्रति जितनी ईमानदारी से कर्तव्य निभाया उतनी ही लगन से समाजसेवा में लगी हैं।

बच्चों को किताबे देती हुई शोभा बाजपेयी।

कभी बेकार नहीं जाता संघर्ष
सुश्री बाजपेयी कहती हैं समाज को बदलना बदलना चुनौतीपूर्ण काम है, लेकिन असंभव नहीं। सुश्री बाजपेयी एनसीईआरटी की पुस्तक लेखन टीम में शामिल रहीं। ये किताबें सेंट्रल स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। बीते साल छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के लिए बनी टीचर्स हैंडबुक तैयार करने में भी वे शामिल रहीं। वे कहती हैं कि आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए कई परिवार महिलाओं को काम की आजादी तो देते हैं, लेकिनइच्छा से अपनी कमाई खर्च नहीं कर सकती हैं।

शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जतन
अपने जैसी सोच रखने वाले कुछ शिक्षकों व परिचितों के साथ शहर से 18 किमी दूर हीरापुर की टेकरी पर 2000 में गरीब बच्चों के लिए लायब्रेरी शुरू की। 2013 में विस्तार कर इसे शहर की नई आबादी, दूध डेयरी जैसी निचली बस्तियों में शुरुआत की। महिलाएं-युवतियां, पढ़ाई कामकाजी बच्चे भी यहां आने लगे। दूसरे जिलों और राज्यों में बसे पुराने साथियों ने भी किताबों के लिए सहयोग किया। अब वनांचल के महागांव व रोलगांव में भी इसे शुरू किया। अब बघवाड़ में शुरुआत की तैयारी है। लाइब्रेरी से सैकड़ों, युवतियां, महिलाएं, बच्चे लाभांवित हो रहे हैं। बच्चों को नैतिक शिक्षा, संस्कार, पर्यावरण, आत्मनिर्भरता के लिए भी प्रेरित किया जाता है। अब मुस्लिम महिलाएं उर्दू की किताबों की फरमाइश करती हैं तो इसके भी बंदोबस्त किए।

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