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सास काे आया अटैक, खान-पान में बदलाव के लिए बहू 3 एकड़ में कर रही जैविक खेती

एक वर्ष पहले
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खेती में बढ़ते रासायनिक खाद व कीटनाशक के उपयाेग के सेहत पर पड़ रहे प्रतिकूल असर देखने के बाद खिरकिया विकासखंड के पीपल्या भारत की एक महिला जैविक खेती के लिए लाेगाें काे प्रेरित करने में लगी है। इसकी शुरुआत उसने खुद के घर से की है। 2 साल से 3 एकड़ में हर प्रकार की जैविक सब्जियां व फल उगा रही हैं। इन्हें माेहल्ले व गांव में भी बांटती हैं। जैविक खेती व खाद बनाने का दूसरे जिलाें में प्रशिक्षण लिया। अब किसानाें काे अपने अनुभव बताने गांव-गांव व शहराें में जाती हैं। इसके अलावा गृहस्थी काे आर्थिक सहारा देने के लिए 8वीं पास क्षमा राजपूत ने सिलाई व जनरल स्टाेर शुरू की। जिससे वह महिलाओं के लिए गांव में आदर्श बनकर उभर रही हैं।

क्षमा राजपूत के पति मंगलसिंह 7वीं पास हैं। उनका एक बेटा व एक बेटी है। क्षमा बाई बताती हैं कि उनकी सास काे 60 साल की उम्र में अटैक आ गया। भाेपाल में भर्ती कराया। डाॅक्टराें ने जैविक खान-पान के उपयाेग की समझाइश दी। यह बात उनके मन में बैठ गई कि रासायनिक खाद से तैयार खाने-पीने की हर चीज इंसान की सेहत पर आज नहीं ताे कल जरूर विपरीत असर डालेगी। वे घर अाईं। तभी 3 एकड़ जमीन में जैविक खेती का निर्णय लिया। परिवार भी सहमत हाे गया। वे जैविक खेती के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानतीं, समझतीं थी। तब बाबई हाेशंगाबाद में 6 दिन की ट्रेनिंग ली। फिर ओंकारेश्वर में ट्रेनिंग ली। लाैटकर खेती में अमृतजल, भू-नाडेप, नाडेप, एजोला का उपयोग शुरू किया। कीटनाशक व रासायनिक खाद का बिल्कुल उपयाेग नहीं करती हैं।

उनकी यह है साेच


क्षमाबाई ने कहा वे सभी किसानाें से केवल यह संकल्प चाहती हैं कि वे 20 से 25 प्रतिशत रकबे में ही जैविक खेती की शुरुआत करें। इन उत्पादाें का परिवार में उपयाेग करें। जैविक उत्पाद की बाजार में खूब मांग है। यह महंगा बिकता है। इससे लागत व लाभ निकल आता है। इसी तरह धीरे-धीरे जैविक खेती काे बढ़ावा मिलना संभव है। वे किसानाें काे इसका संकल्प भी दिलाती हैं। कृषि विभाग का जैविक खेती का बढ़ता रकवा ऐसे लाेगाें के प्रयासाें की पुष्टि करता है।


एेसे हुई शुरुआत : परिवार को साथ लिया, अब अन्य किसानोंे को भी प्रेरित कर रही हैं महिला किसान क्षमा


क्षमाबाई बताती हैं कि उनका संयुक्त परिवार है। 3 एकड़ में जैविक खेती से भरपूर उत्पादन व अन्य खर्चाें की पूर्ति संभव नहीं थी। तब परिवार काे समझाया कि जैविक उत्पाद के कई फायदे हैं, आज न कल व्यवस्था बन जाएगी। फिर उन्हाेंने छोटे टुकड़ाें में गेहूं, चना, मसूर, धना, तुअर, मटर, राजगीरा, गोभी अाम, चीकू, जाम, पपीता, कटहल, सुरजना लगाया। घर में 10 पशु थे। गाेबर से खाद बनाने के लिए नाडेप टांके बनाए। इसी खाद का खेती में उपयाेग किया। हरी पत्तियाें, गाेमूत्र काे भी इसमें मिक्स किया। इससे सब्जियाें व फल के पेड़ में काेई कीट या बीमार नहीं लगी। 3 एकड़ में इतनी पैदावार हाेने लगी कि परिवार की जरूरत के बाद पड़ाेस व परिचिताें काे भी जैविक सामग्री देने लगे। किसानाें काे रासायनिक खाद का उपयाेग ना करने का संकल्प दिला रही हैं। जैविक खेती में उनकी रुचि काे देखते हुए कृषि विभाग ने उन्हें कृषि सखी बनाया। उप संचालक कृषि एमपीएस चंद्रावत ने बताया कि जैविक खेती के प्रति क्षमाबाई राजपूत का समर्पण और बेहतर परिणाम को देखते हुए हमने उन्हें कृषि सखी बनाया है। हाेशंगाबाद, भाेपाल, मंडला जाकर उन्हाेंने इसके दायित्व व बारीकियाें काे सीखा। अब वे काकड़कच्छ, लोनी, लोलांगरा, पीपल्या भारत, मुहालकलां आदि गांवाें में किसानाें काे जैविक खेती और पशुपालन के लाभ बताती हैं।


हरदा। खेत में काम करती हुई क्षमाबाई।
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