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मां पुण्यवाणी से मिलती है, जबकि पत्नी पसंद से मिलती है : विनय मुनि
मां पुण्यवाणी से मिलती है, जबकि प|ी पसंद से मिलती है। हमें पसंद के पीछे पुण्यवाणी को कम नहीं करना चाहिए। सुसंस्कार की पहली पाठशाला मां है। जो मां का नहीं होगा, वह महात्मा का नहीं हो सकता और जो महात्मा का नहीं हो सकता, वह परमात्मा का भी नहीं हो सकता। यह बात श्वेतांबर जैन संत विनय मुनि ने शनिवार को समता भवन में व्याख्यान में कही। बच्चों को शिक्षा के साथ साथ संस्कार देने की आवश्यकता है। परंतु आज संस्कारों का अभाव है। आचार्यश्री नानेश में तीन विशेषता एक साथ थी। मां की ममता, पिता का स्नेह और संत की समता। इसके पहले मधुर मुनि मसा ने कहा कि आत्मा में कषाय की दुकान खुलने से जन्म-मरण की श्रंखला बढ़ जाती है। कषाय के परिणामस्वरूप व्यक्ति नर्क में जाता है। कषायों को दूर करके अपनी आत्मा को स्वच्छ बनाएं। आत्म कल्याण करना है तो राग द्वेष रूपी गांठ को छोड़ना होगा और मैत्री रूपी संबंध स्थापित करना होगा। हमें ज्ञानचंद, हुकुमचंद और रायचंद बनकर संतों के पास नहीं जाना चाहिए। हम पापों से बचें एवं धर्म से जुड़ें। इस अवसर सैकड़ों उपासक व गुरुभक्त उपस्थित थे।