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सच्चे माता-पिता वही हंै जो अपने बच्चों को धनवान नहीं पुण्यवान बनाते हैं : विनय मुनि
समता भवन में श्वेतांबर जैन संत व्याख्यान देते हुए यह बात कहीं
पर्व का अर्थ होता है अपनी आत्मा को पवित्र और निर्मल बनाना। रिश्तों को मजबूती देना। पर्व दो प्रकार के होते हैं। पहला लौकिक पर्व, जिससे इंद्रियां पुष्ट होती है।
दूसरा लोकोत्तर पर्व, जिससे आत्मा पुष्ट होती है। पर्वों का प्रारंभ निश्चित ही किसी घटना विशेष से होता है। यह बात श्वेतांबर जैन संत विनय मुनि ने सोमवार को समता भवन में व्याख्यान देते हुए कही। होली के दिन हमें अपने पापों व दोषों की आलोचना करना चाहिए। इस दिन मैत्री का रंग लगाना चाहिए। यदि इस पर्व को सही रूप से मनाया जाए तो वह हमारे लिए वरदान बन जाएगा। नहीं तो अभिशाप बनकर रह जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि संस्कार की पहली पाठशाला माता पिता है। सच्चे माता पिता वही है जो अपने बच्चों को धनवान नहीं पुण्यवान बनाते हैं। संत समागम मिलने सेे भी बच्चे संस्कारित बनते हैं। हमें शिक्षा रूपी दूध में संस्कार रूपी शक्कर डालना चाहिए। भक्ति से शक्ति आती है। भक्ति का सदुपयोग करने से सृर्जन व विकास होता है। जबकि दुरुपयोग करने से विनाश होता है। मधुर मुनि मसा ने बताया कि दुख का परिणाम आसक्ति है। आसक्ति कर्म बंधन का कारण है। तीर्थ चार प्रकार के होते हैं साधु, साध्वी, श्रावक व श्राविका। तप के बिना मुक्ति नहीं मिलती। हम अपनी आत्मा को त्याग तपस्या व पचखान से सजाएं। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।