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40 साल संघर्ष का सफर, अब नाती पोतों के साथ बीत रहा समय

कहते हैं वक्त सदैव करवट लेता है,संकल्प के आगे विकल्प नहीं टिक पाता। ऐसी ही कुछ कहानी है नगर की 93 वर्षीय भागवती देवी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 09, 2018, 03:05 AM IST

कहते हैं वक्त सदैव करवट लेता है,संकल्प के आगे विकल्प नहीं टिक पाता। ऐसी ही कुछ कहानी है नगर की 93 वर्षीय भागवती देवी खटीक की। जिन्होंने देश की आजादी के साथ ही संघर्ष प्रारंभ किया था।

पति जहां बाजार में फुटपाथ पर सब्जी की दुकान लगाते थे, वहीं कच्चे मकान की दीवार की ओट में बैठकर भागवती देवी बीड़ी बनाकर पति का आर्थिक सहयोग देती थी। लगभग 40 साल तक जीवन के कठिन समय बिताने के साथ उन्होने अपनी तीन बेटियों का विवाह किया। दो बेटों की पढ़ाई कराई।

बड़े बेटे प्रकाशचंद्र खटीक को 1982 में शिक्षक बनाया तो छोटे पुत्र विनोद खटीक को पीएससी में चयन होने पर आबकारी निरीक्षक बनाया, जो वर्तमान में विदिशा जिला के आबकारी अधिकारी हैं। साथ ही नगर के मध्य स्वयं के नाम पर भागवती देवी शिक्षण संस्थान चला रही हैं। संस्थान के संचालक नाती र|ेश खटीक ने बताया कि दादी के बारे में सभी बताते हैं, वे अपने बेटो के साथ अपने आसपास के बच्चों को भी स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती थीं। संस्थान में आज भी गरीब छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। स्वयं निरक्षर होने के बाबजूद भी शिक्षा के क्षेत्र में उनका विशेष लगाव होने के कारण ही शिक्षण संस्थान प्रारंभ किया गया है। राष्ट्रीय पर्व पर उन्हीं के द्वारा ध्वजा रोहण किया जाता है। दादी फाइलें भी पलटकर देखती हैं, छात्रों के अभिभावकों द्वारा कहीं जाने वाली बातों को गौर से सुनती हैं।

भागवती देवी ने अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि पांच-छह के दशक में एक हजार बीड़ी बनाने पर मात्र पांच से दस रूपया साप्ताहिक मिला करता था।

घर खर्च के बाद पैसा बचाना मुश्किल होता था। जैसे-तैसे पैसा बचाकर बेटियों का विवाह किया, दोनों बेटों की पढाई कराई। बेटा भी पढ़ाई के साथ घर खर्च के हाथ बटाने लगे थे। धीरे-धीरे खेती की जमीन भी खरीदी। पढ़ाई उपरांत एक शिक्षक तो एक अफसर। अब तो समय तीर्थ यात्रा में जाता है, चारों धाम की तीर्थ कर लिये है, नाती पोतों के साथ समय व्यतीत होता है।

दीवार की ओट में बैठकर निरक्षर भागवती देवी बीड़ी बनाकर अपने बेटे को बनाया अफसर

जितना संघर्ष करोंगे, उतना सीख भी मिलेगा

भागवती देवी ने नई पीढ़ी को संदेश देते हुए कहा कि आज बहुएं घर में पैर रखते ही विचलित हो जाती हैं। वक्त से समझौता उसे मानने को तैयार नहीं, जो संघर्ष की कहानी हमारे जीवन की है। लगभग अधिकांश घरों की भी वहीं कहानी है, बुजुर्गो के साथ बैठें तो पता चले कि उन्होंने कैसे समय बिताया, आज सारे संसाधन हैं तो कैसे एकत्रित हुए। जिसका का जितना संघर्ष रहा है उतना उसे सुख भी प्राप्त होता है।

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