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डूंगरपुर | राजस्था

आदिवासी महाकुंभ की ड्रोन से ली गई पहली तस्वीर सिर्फ भास्कर में राजस्थान के डूंगरपुर में माही, सोम और जाखम...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:00 PM IST

आदिवासी महाकुंभ की ड्रोन से ली गई पहली तस्वीर सिर्फ भास्कर में

राजस्थान के डूंगरपुर में माही, सोम और जाखम नादियों के संगम पर हर साल आदिवासी समुदाय का महाकुंभ लगता है। पहली बार भास्कर ने अपने पाठकों के लिए महाकुंभ मेले की तस्वीर ड्रोन के जरिए ली है। फोटो और कंटेंट: ताराचंद गवारिया


डूंगरपुर | राजस्थान के डूंगरपुर जिले के बेणेश्वरधाम में माही, सोम और जाखम नदियों के संगम (वागड़ प्रयाग) पर हर साल आदिवासी महाकुंभ आयोजित होता है। बुधवार को माघ पूर्णिमा के मौके पर संगम पर एक लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने स्नान किया। इसमें गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान समेत 10 राज्यों के लोग पहुंचे हैं। वैसे तो आदिवासी महाकुंभ मेला करीब एक महीने तक चलता है, पर मुख्य मेला सिर्फ 8 दिन चलता है। इस बार यह मेला 27 जनवरी को शुरू हुआ है, जो 3 फरवरी को समाप्त होगा। अब तक मेले में करीब 5 लाख लोग पहुंच चुके हैं। यह उत्तर भारत में आदिवासी समाज का सबसे बड़ा मेला भी है।

राजस्थान के डंूगरपुर में माघ पूर्णिमा पर एक लाख लोगों ने स्नान किया

आदिवासी महाकुंभ के पहले 5 दिन में 5 लाख लोग आए

8 दिन के इस आदिवासी महाकुंभ मेले में राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात समेत 10 राज्यों से श्रद्धालु पहुंचे हुए हैं

होशंगाबाद, गुरुवार, 01 फरवरी, 2018

मेला 24 घंटे लगा रहता है

खास है कि मुख्य मेले के 8 दिन तक दुकानें 24 घंटे खुली रहती हैं।

करीब 450 साल से आदिवासी महाकुंभ का आयोजन हो रहा है।

धनुष-बाण, महंत के शाही स्नान और पालकी यात्रा रहे आकर्षण के केंद्र

महाकुंभ मेले में धनुष-बाण की जमकर बिक्री हो रही है। इसके अलावा आदिवासी समाज के परिधान भी बिक रहे हैं। बुधवार को मेले का मुख्य आकर्षण निष्कलंक अवतार की पालकी यात्रा और संगम पर महंत अच्युतानंद का शाही स्नान रहा। पालकी मावजी महाराज की जन्मस्थली साबला के हरि मंदिर से निकाली गई। सैकडों धर्मध्वजाओं, भजन-कीर्तन, गाजे-बाजे एवं रासलीला के साथ इस पालकी यात्रा में भक्तों ने आनंद लिया।

माघ पूर्णिमा स्नान के मौके पर श्रद्धालुओं ने आबूदर्रा स्थित संगम घाट पर मृत परिजनों की अस्थियों को पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ विसर्जित किया।

यहां लोग हर साल पूर्वजों का पिंडदान भी करते हैं। इस मेले पर शोध कर रहे कमलेश शर्मा बताते हैं कि यह महाकुंभ करीब 1548-1580ई. के बीच शुरू हुआ था।

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