बैतूल / उस्ताद से सुनकर नेत्रहीन कामिल ने याद किए कुरान 23 के पारे

बैतूल। उस्ताद सैय्यद सोहेब हुसैन के साथ हाफिज कामिल रजा बरकाती। बैतूल। उस्ताद सैय्यद सोहेब हुसैन के साथ हाफिज कामिल रजा बरकाती।
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बैतूल। उस्ताद सैय्यद सोहेब हुसैन के साथ हाफिज कामिल रजा बरकाती।बैतूल। उस्ताद सैय्यद सोहेब हुसैन के साथ हाफिज कामिल रजा बरकाती।

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2019, 01:18 PM IST

बैतूल(परवेज खान)। बैतूल के कोठी बाजार क्षेत्र के आजाद वार्ड में रहने वाले नेत्रहीन कामिल रजा पहले ऐसे शख्स हैं जिन्हें कुरान के 23 पारे याद हैं, इसलिए वे अब हाफिजे कुरान कहलाने लगे हैं। दरअसल, कामिल रजा पैदाइशी नेत्रहीन हैं, उन्हें कुरान शरीफ (मुस्लिम धर्मग्रंथ) के 30 पारों की मोटी किताब में से 23 पारे कंठस्थ हैं। वे इन पारोें (चैप्टरों की बरकाती छोटी-छोटी किताब) में जहां से पूछो, वहां से सुना देते हैं। यहां तक की अलफाज, आयत और रूकू व सूरह के बारे में बताए जाने पर वहां से पढ़ देते हैं। यह उन्होंने अपने उस्ताद हाफिज सैय्यद सोहेब हुसैन से सुन-सुनकर सीखा है।


उस्ताद ने पढ़कर सुनाया, दाेहराकर किया याद
घर के बाजू में मदरसा चलता है। बड़े होने पर वहां कुछ सीखने के लिए परिवार के लोग छोड़ आते थे। आंखों से नहीं दिखाई देने पर मदरसे में उनके सीखने लायक कुछ नहीं था। क्योंकि यहां पर सभी सामान्य बच्चे आते थे। इसलिए उसे परेशानी हुई। फिर मदरसा में तिलक वार्ड निवासी सैय्यद सोहेब हुसैन बच्चों को पढ़ाने आए। उनकी मुलाकात कामिल रजा से हुर्इ। उन्होंने रजा को कुरान शरीफ पढ़ने की बात कही और वे उसे मुंह जबानी पढ़ाने लगे। वे पढ़ते और कामिल रजा सुनते और याद करते। फिर अपने उस्ताद को सुनाते। छह साल हो चुके हैं। कामिल को अब कुरान शरीफ के 23 पारे पूरी तरह याद हैं।

पहले होता था रंज, अब होती है खुशी
कामिल रजा के पिता शेख शमीम एल्युमीनियम से जुड़े काम करते हैं। वे कहते हैं कि कामिल की दोनों आंखें न होने पर तकलीफ होती थी।

रब की मेहरबानी- अब आंख वालों का सबक सुनते हैं
मदरसे में पढ़ाने वाले सैय्यद सोहेब हुसैन कहते हैं कि शुरुआती दौर में थोड़ी कठिनाई गई, लेकिन अब कामिल रजा को 23 पारे याद हो चुके हैं। मदरसा में पढ़ने वाले ज्यादा बच्चे होने पर वे सामान्य बच्चों का सबक भी सुन लेते हैं।

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