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रामचरितमानस ऐसा ग्रंथ है जो परिवारों को व्यवहारवाद की शिक्षा देता है : पं. शास्त्री

2 वर्ष पहले
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श्री रामचरितमानस ऐसा ग्रंथ है जो परिवारों को व्यवहारवाद की शिक्षा देता है। ग्रंथ्र के रचियता गोस्वामी तुलसीदास का 522 वां जन्मदिवस दुर्गा नवग्रह मंदिर में मनाया गया।

तुलसीदास के जीवन चरित्र एवं उनके कृतित्व के बारे में पं. मधुसूदन शास्त्री ने बताया। उन्होंने कहा तुलसीदास जी ने सनातन संस्कृति के परिवार को संचालित करने के लिए श्रीरामचरित मानस में उन सभी बातों का उल्लेख किया है जो परिवार को एकजुट रखकर उसे आगे बढ़ाने में मदद करती है।

पं. शास्त्री ने कहा कि आज के जमाने में कोई पुस्तक लिखता तो वह उसकी रायल्टी लेता है। गोस्वामी तुलसीदास बिना रायल्टी ऐसी पुस्तक लिख गए जिसमें एक करोड़ से अधिक कथा वाचक अपने जीवोपार्जन के लिए रामकथा पर प्रवचन देते हैं।

जयंती कार्यक्रम में बताया गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम चरितमानस की रचना 2 वर्ष 7 महीने 26 दिन में की। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों कांड पूरे हुए। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली और विनयपत्रिका भी लिखी। संवत् 1680 को श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट बनारस में गोस्वामी जी ने शरीर त्याग दिया।

भास्कर संवाददाता| इटारसी

श्री रामचरितमानस ऐसा ग्रंथ है जो परिवारों को व्यवहारवाद की शिक्षा देता है। ग्रंथ्र के रचियता गोस्वामी तुलसीदास का 522 वां जन्मदिवस दुर्गा नवग्रह मंदिर में मनाया गया।

तुलसीदास के जीवन चरित्र एवं उनके कृतित्व के बारे में पं. मधुसूदन शास्त्री ने बताया। उन्होंने कहा तुलसीदास जी ने सनातन संस्कृति के परिवार को संचालित करने के लिए श्रीरामचरित मानस में उन सभी बातों का उल्लेख किया है जो परिवार को एकजुट रखकर उसे आगे बढ़ाने में मदद करती है।

पं. शास्त्री ने कहा कि आज के जमाने में कोई पुस्तक लिखता तो वह उसकी रायल्टी लेता है। गोस्वामी तुलसीदास बिना रायल्टी ऐसी पुस्तक लिख गए जिसमें एक करोड़ से अधिक कथा वाचक अपने जीवोपार्जन के लिए रामकथा पर प्रवचन देते हैं।

जयंती कार्यक्रम में बताया गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम चरितमानस की रचना 2 वर्ष 7 महीने 26 दिन में की। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन सातों कांड पूरे हुए। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली और विनयपत्रिका भी लिखी। संवत् 1680 को श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट बनारस में गोस्वामी जी ने शरीर त्याग दिया।

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