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9 साल की गुड़िया मोह-माया का त्याग कर बनी साध्वी, अब इस नाम से जाना जाएगा उसे

संसार की मोह-माया, ऐश्वर्य छोड़कर चुनी संयम और वैराग्य की राह, मिला जैन साध्वी का दर्जा।

Dainik Bhaskar

Mar 05, 2018, 01:00 AM IST
9 years old girl will became monk

इंदौर. बच्ची, युवती से लेकर वृद्धा तक के एक साथ दीक्षा लेकर वैराग्य की राह पर चलने के ऐतिहासिक क्षण का रविवार को दलालबाग में मौजूद हर शख्स साक्षी बना। शहर में पहला मौका था जब एक साथ तीन दीक्षा हुई।
9 साल की परी (प्रियांशी), 18 वर्षीय शिवानी और 75 वर्षीय कमलाबेन ने सांसारिक जीवन को त्याग कर वैराग्य का मार्ग अपनाया और साध्वी बन गईं। चार आचार्य और तीन सौ से अधिक साधु-साध्वी भगवंतों की मौजूदगी में तीन घंटे दीक्षा विधि चली। हजारों लोगों की मौजूदगी में परी को सोहम निधिश्रीजी, शिवानी को ग्रंथ ज्योतिश्रीजी और कमलाबेन को मोक्षिताश्री जी के नए नाम से जाना जाएगा।

अनुपम दृश्य : डोली में बैठकर आई परी
- गच्छाधिपति दौलतसागर, आचार्य नंदीवर्धन सागर, आचार्य जीतरत्नसागर, आचार्य हर्ष सागर व आचार्य विश्वरत्न सागर के सान्निध्य में दीक्षा की प्रक्रिया शुरू हुई।

- सुबह 7.20 बजे सबसे पहले कमलाबेन को उनके परिजन मंच तक लाए।

- उनके बाद शिवानी को परिजन गोद में उठाकर मंच तक लाए। उन्होंने गुलाबी रंग का लहंगा -चुनरी पहन रखी थी।

- इसके बाद थांदला की बाल मुमुक्षु परी आई, जिसे परिजन डोली में बैठाकर मंच के नजदीक लाए और फिर गोद में उठाकर मंच पर ले गए।

दीक्षा विधि : पिच्छी लेकर नृत्य किया
- तीनों दीक्षार्थियों को जैनाचार्यों ने पिच्छी और आसन देकर मंत्र पढ़कर सिर पर वासक्षेप की वर्षा कर सुरक्षाकवच प्रदान किया।

- पिच्छी लेकर उन्होंने नृत्य करते हुए समवशरण की परिक्रमा की।

- चैत्यवंदन, नंदीसूत्र के वाचन व सकल श्रीसंघ से अनुमति के बाद रिश्तेदारों ने अंतिम विजय तिलक लगाकर उन्हें अपना वेश बदलने के लिए अलग कक्ष में जाने की सहमति प्रदान की।

मोह-माया का त्याग : आधे घंटे में बदली जीवन की राह
- आधे घंटे बाद जब तीनों वापस उसी मार्ग से लौटीं तो उनका परिवेश साध्वी का था और साध्वी जीवन में प्रयुक्त होने वाली सभी चीजें उनके कांधे पर शोभित थीं।

- जैसे ही 8.40 बजे उन्होंने साध्वी वेश में प्रवेश किया, दर्शन की एक झलक पाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।

- मंच पर पहुंचने के बाद अन्य साध्वीवृंद के सहयोग से तीनों साध्वियों के बचे हुए सात केश लोचन कर रिश्तेदारों को सौंपे गए।

- साध्वी परिवेश के बाद उन्होंने सत्तरभेदी पूजा संपन्न की। वेश परिवर्तन, केशलोच, पचकाण की विधियां संपन्न होते ही जैनाचार्यों ने उन्हें नए नाम प्रदान किए।

संयोग यह भी : बेटा-बेटी के बाद मां ने चुना वैराग्य
- दीक्षा के दौरान एक संयोग भी बना। कमलाबेन जैनाचार्य विश्वरत्नसागरजी के संसारी जीवन की माताजी हैं।

- इससे पहले कमलाबेन की बड़ी बेटी भी 35 वर्ष पूर्व दीक्षा ले चुकी हैं। वे चंद्ररत्नाश्रीजी के नाम से जानी जाती हैं।

- इस तरह अब सागर सूरीश्वर समुदाय में मां, बेटा और बेटी, तीनों साध्वी जीवन की राह पर चल रहे हैं।

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