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सिंगापुर में ड्रायवर से बात कर आया था ये Idea, इन 11 बच्चों ने किया ये कामाल

फख्र से अब सर उठा के हिंद तेरा आज़ाद है हर शय यहां आज़ाद है, हर मन यहां आज़ाद है शहर के 11 नौनिहालों ने कुछ इस अंदाज़ मे

Dainik Bhaskar

Jan 26, 2018, 05:12 PM IST
children Songs on Republic Day In Indore

इंदौर। "फख्र से अब सर उठा के हिंद तेरा आज़ाद है... हर शय यहां आज़ाद है, हर मन यहां आज़ाद है...' शहर के 11 नौनिहालों ने कुछ इस अंदाज़ में ज़ाहिर किए हैं वतन के लिए अपने जज़्बात। पूरे शहर ने उनकी आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया यह गीत सुना। मशहूर प्लेबैक सिंगर दिव्य कुमार के साथ उन्होंने यह गीत रिकॉर्ड किया है। दिव्य बाहुबली, भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्मों के गीत गा चुके हैं। उनकी और इंदौर के इन नन्हे हुनरमंदों की आवाज़ आज गणतंत्र दिवस पर इंदौर में गूंजीं। यह गीत 26 जनवरी को माय एफएम पर रिलीज़ किया जाएगा। यूट्यूब पर इसे लॉन्च किया जा चुका है।


विदेश में बस जाऊंगा तो जन-गण-मन कैसे गा पाऊंगा

इस गीत के लिखे जाने के पीछे एक किस्सा है। ऑरकॉम एडवर्टाइज़िंग की डायरेक्टर कविता शर्मा ने बताया काम के सिलसिले में मैं अक्सर विदेश जाती हूं। यह तब की बात है जब मैं अपने बेटे के साथ सिंगापुर गई थी। वहां टैक्सी ड्राइवर ने हमसे पूछा आपका देश कैसा है। हमने कई समस्याएं बताई उसे। मैंने अपने बेटे से कहा तुम यहां सैटल हो जाना। बेटे ने कहा फिर मुझे यहां का राष्ट्रगान गाना होगा। उस ड्राइवर ने जब सिंगापुर के बारे में बताया तो सिर्फ तारीफ की। मन ग्लानि से भर गया। मुझे अहसास हुआ कि इराक जैसे देश में तो बच्चे मर्ज़ी से मैदान में खेल तक नहीं सकते, जबकि भारत में हमें अपनी मर्ज़ी से जीने की पूरी आज़ादी है। हमने शहर के 7 से 13 साल के बच्चों से बात की और जाना कि वे क्या सोचते हैं अपने देश के बारे में। उन्होंने सारी अच्छी बातें कहीं। उन्हीं के जवाबों को इस गीत के रूप में ढाला गया है। एड फिल्ममेकर दिव्यांश गंजू ने इसे लिखा है। बच्चों को गाइड किया है गायिका कनकश्री भट्‌ट ने।
तो क्या जो कश्ती कागज की है, मत भूल लहरों से लड़ी है

इस बीत का मुखड़ा है तो क्या जो बर्नी कांच की है, खुशियों से भरी है/ तो क्या जो कश्ती कागज की है, मत भूल लहरों से लड़ी है/ पतंग की पूंछ बनकर उम्मीदें आसमां छू रही हैं/ यूं सोचे हाथ तेरे क्या, क्या, क्या, क्या, क्या नहीं है/ खोट का चश्मा उतार, देख इस तस्वीर को/ भूल के हर ग़म तेरा, रंग दे तकदीर को/ है मिला जो तुझे बोल उस पर नाज़ है/ फख्र से अब सर उठा के हिंद तेरा आज़ाद है/ हर शय यहां आज़ाद है, हर मन यहां आज़ाद है...







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