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पंच तत्व में विलिन हुए मौनी बाबा...हजारों भक्तों ने दी अंतिम विदाई

76 सालों से मौन रहकर साधना कर रहे 109 साल के ख्यात संत मौनी बाबा की पार्थिव देह रविवार को पंच तत्व में विलिन हो गई।

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 12:04 PM IST
बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए मौनीतीर्थ गंगाघाट पर हजारों भक्तों की भीड़ उपस्थित थी। बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए मौनीतीर्थ गंगाघाट पर हजारों भक्तों की भीड़ उपस्थित थी।

इंदौर। 76 सालों से मौन रहकर साधना कर रहे 109 साल के ख्यात संत मौनी बाबा की पार्थिव देह रविवार को पंच तत्व में विलीन हो गई। बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए मौनीतीर्थ गंगाघाट पर हजारों भक्तों की भीड़ उपस्थित थी। बाबा को उनके मानस पुत्र संत सुमन भाई मानस भूषण ने मुखाग्नि दी। गौरतलब है कि पुणे में उपचार के दौरान शनिवार सुबह बाबा का निधन हो गया था। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट कर श्रृद्धांजलि दी है।

पुणे से एयर एंबुलेंस से इंदौरएयरपोर्ट व वहां से सड़क मार्ग से एंबुलेंस से पार्थिव देह आश्रम

- शनिवार रात करीब 8.15 बजे बाबा की पार्थिव देह गंगाघाट आश्रम पहुंची। पुणे में बाबा का इलाज पाटिल के अस्पताल में चल रहा था। पुणे से एयर एंबुलेंस से इंदौर एयरपोर्ट व वहां से सड़क मार्ग से एंबुलेंस से पार्थिव देह आश्रम लाई गई। जैसे ही एंबुलेंस से कॉफिन उतारा। वहां मौजूद अनुयायी फफक पड़े। देर रात तक आश्रम पर नागरिकों व अनुयायियों का आना जारी था। उनके बीच बाबा के स्मरण सुनाई देते रहे।

बाबा की ये बातें जो सब नहीं जानते

- बाबा निराहारी थे, उन्होंने कभी अन्न का सेवन नहीं किया।

- नित्य स्नान करते थे, अस्पताल में भी उन्होंने क्रम नहीं तोड़ा। दिसंबर-2016 में अस्पताल में गर्म पानी नहीं मिलने पर उन्होंने दूसरी जगह स्नान किया।

- जीवन में केवल एक बार 19 अप्रैल 2016 को रामघाट पर शिप्रा स्नान करने गए।

- वे आश्रम के कई काम स्वयं करते या आश्रमवासियों की मदद करने लगते थे।

बाबा के अनुयायियों में देश के नई नामचीन नेता, उद्योगपति, कलाकार शामिल

बाबा की सेवा में तत्पर रहने वाले एडवोकेट कैलाश विजयवर्गीय बताते हैं- बाबा यूं तो कहां से आए कोई नहीं जानता लेकिन यह माना जाता है वे हरिद्वार के हैं और तपस्या के लिए पश्चिम बंगाल गए। तपस्या के बाद 1960 में उज्जैन आए। यहां नृसिंहघाट पर उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। 1966 में किबे साहब उन्हें गंगाघाट के समीप स्थित अपनी धर्मशाला में लाए। 1975 में कांग्रेस नेता अर्जुनसिंह बाबा के संपर्क में आए। सिंह इसके बाद मप्र के मुख्यमंत्री बने। बाबा के अनुयायियों में देश के नई नामचीन नेता, उद्योगपति, कलाकार शामिल हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, उमा भारती, महारानी त्रिपुरा, राज्यसभा सांसद अमर सिंह, अभिनेत्री जयाप्रदा के साथ ही देश के कई नामी राजनेता, उद्योगपति और बड़ी हस्तियां उनके आश्रम जाती रही हैं। संत सुमनभाई सांसारिक रिश्ते से उनके भांजे हैं। उन्होंने बाबा को गुरु मानकर आश्रम में सेवा शुरू की।

वेद विद्या प्रतिष्ठान की अवधारणा

अर्जुनसिंह जब केंद्र में मानव संसाधन मंत्री बने तो बाबा ने ही उन्हें देश में वेदों के अध्ययन-अध्यापन के लिए केंद्र खोलने को कहा था। इसके बाद सिंह ने वेद विद्या प्रतिष्ठान की योजना बनाई और इसका मुख्यालय उज्जैन में स्थापित किया। बाबा ने कुछ समय से हर रविवार को आम लोगों से मिलने की शुरुआत की थी। उनसे मिलने आए लोग अपनी समस्याएं बताते तो वे स्लेट पर उत्तर लिख देते थे। यह क्रम चलता रहा। जो लोग शहर के बाहर से आते थे, उन्हें वे भोजन किए बिना नहीं जाने देते थे।

50 साल पहले गंगाघाट को बनाया साधना स्थली

- मौनी बाबा 50 साल पहले कलकत्ता से उज्जैन आए। वे शिप्रा किनारे नृसिंह घाट पर भक्तों के साथ ठहरे। कुछ वर्ष बाद गंगाघाट को तपस्थली के लिए चुना। साहित्यकार रमेश दीक्षित के मुताबिक उनके जन्म और जन्म स्थान के बारे में किसी को पता नहीं है। बस पांच दशकों से अनुयायी 12 से 14 दिसंबर तक उनका जन्मोत्सव मना रहे हैं। इसमें देशभर के कलाकार और कलाप्रेमी शामिल होते है।

- सिंहस्थ 2004 में 108 साल के लिए अखंड महायज्ञ शुरू किया, जो निरंतर किया जा रहा है।
- महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विदुषी विद्योत्मा स्त्री शक्ति सम्मान शुरू किया। यह 2001 से चल रहा है। इसमें 51 हजार रुपए सम्मान राशि दी जाती है।

- समाज कार्य के लिए प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रविभूति जटायु सम्मान भी 2001 में शुरू किया।

- बाबा ने अध्यात्म के साथ राष्ट्रीयता की भावना संप्रेषित करने के लिए आश्रमों में राष्ट्रीय ध्वज लगाने लिए प्रेरित किया तथा अपने आश्रम में भी 14 दिसंबर 2016 को विशाल ध्वज फहराया।


अस्पताल जाते वक्त 3 महीने पहले बाबा ने हटवा दिया था अपना आसन

गंगाघाट पर बाबा ने करीब 12 साल पहले यज्ञशाला बनवा कर रोज 108 आहुति से यज्ञ करने की शुरुआत कराई। वे स्वयं यज्ञ में शामिल होते थे। यज्ञशाला में उनका आसन लगा था। 15 साल से बाबा के साथ धार्मिक क्रियाकलापों में शामिल रहने वाले पं. जीवन भट्‌ट ने बताया करीब 3 महीने पहले बाबा इलाज के लिए जा रहे थे। अचानक बोले- मेरा आसन यज्ञशाला से हटा देना। आप लोग वहां बैठ सकते हो। उस समय तो बाबा की बात हमने गंभीरता से नहीं ली। उनके कहे अनुसार आसन हटा दिया। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उनके यज्ञ में भाग लेने पर रोक ही लगा दी। यह बात पता चली तब ध्यान आया- बाबा तो यज्ञशाला से अपना आसन भी हटवा चुके हैं। उस दिन बाबा यज्ञशाला से निकले तो आज शरीर छोड़ने तक दोबारा प्रवेश नहीं किया।

यज्ञ में रोज दी जाती है विशेष सामग्री की आहुतियां

बाबा ने यह यज्ञ 108 साल तक चलने की घोषणा भी थी। उनका कहना था- मेरे बाद कई पीढ़ियां आएंगी, यज्ञ चलता रहेगा। हमारा संकल्प है बाबा द्वारा शुरू कराया गया यज्ञ हम अनवरत जारी रखेंगे। इस यज्ञ में साधारण समिधा नहीं डाली जाती। बाबा द्वारा तय की गई सामग्री, जिसमें चंदन, सूखे मेवे व औषधीय जड़ी-बूटियां होती है।

मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त। मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त।
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मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त। मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त।
मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त। मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त।
Mauni Baba dissolved in Panchat element ... Thousands of devotees gave their last farewell
Mauni Baba dissolved in Panchat element ... Thousands of devotees gave their last farewell
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बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए मौनीतीर्थ गंगाघाट पर हजारों भक्तों की भीड़ उपस्थित थी।बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए मौनीतीर्थ गंगाघाट पर हजारों भक्तों की भीड़ उपस्थित थी।
मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त।मौनी बाबा को अंतिम विदाई देते भक्त।
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