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​171 प्रोफेसरों का प्रोबेशन पीरियड खत्म करने पर सवाल, 70 को रोकने पर विवाद

कथित तौर पर विवादित 242 नियुक्तियों में से 171 को नियमित किए जाने पर विवाद शुरू हो गया है।

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2017, 06:54 AM IST
professors question over finishing the probation period

इंदौर. मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा 2011 में की गई कथित तौर पर विवादित 242 नियुक्तियों में से 171 को नियमित किए जाने पर विवाद शुरू हो गया है। इस मामले में शिकायतकर्ता ने सवाल उठाए हैं कि जब मामला कोर्ट में है और जांच भी चल रही है तो कैसे शासन ने यह निर्णय लिया। सवाल यह भी उठाया गया है कि जब नियुक्तियों में कोई गड़बड़ी नहीं थी तो सभी प्रोफेसरों का प्रोबेशन पीरियड खत्म क्यों नहीं किया गया? इनमें कई प्रभावी लोगों के रिश्तेदार भी शामिल हैं। सवाल यही है कि आखिर क्या वजह है कि करीब 70 प्रोफेसरों काे नियमित नहीं किया गया। इस मामले की शिकायत मुख्य शिकायतकर्ता पंकज प्रजापति ने पीएम कार्यालय को भेजी है। इसमें सीबीआई जांच की मांग की गई है।

यह है मामला

- पीएचडी के बाद जिन प्रोफेसरों का दस साल टीचिंग अनुभव नहीं है, उन्हें भी नियुक्ति दी गई। यही नहीं दो बच्चों के नियम के उल्लंघन और अन्य नियम-शर्तों को पूरा नहीं कर रहे प्रोफेसरों को भी नियुक्ति दी गई। ऐसे कुल 103 प्रोफेसर थे।

- विवाद के चलते नियुक्तियों के बावजूद शासन ने सभी को प्रोबेशन पीरियड पर रखा था, लेकिन उनमें से 171 को नियमित कर दिया गया है। हालांकि प्रजापति द्वारा हाई कोर्ट इंदौर खंडपीठ में लगाई गई याचिका खारिज हो चुकी है, लेकिन दूसरी याचिका ग्वालियर में लगी है।

नियुक्ति सही नहीं मानने तक प्रोबेशन पीरियड
- सरकारी कॉलेजों में कोई नियुक्ति विवादित होती है या नियमों के उल्लंघन की बात आती है तो ऐसे प्रोफेसरों को प्रोबेशन पीरियड में रखा जाता है, यानी उन्हें नियमित नहीं मानते। जब तक नियुक्ति पूरी तरह सही नहीं मानी जाए, यह अवधि जारी रहती है।

सीबीआई जांच की मांग
- शिकायतकर्ता पंकज प्रजापति ने कहा- मामला गंभीर है। उच्च शिक्षा विभाग के अफसरों ने गलत तरीके से यह अवधि समाप्त की है। हम राज्य और केंद्र सरकार से सीबीआई जांच की मांग करेंगे।

शपथ-पत्र दे चुका है पीएससी

- 2009 में इन नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी हुआ था। तब एक महिला प्राध्यापक ने भी आवेदन किया था। लेकिन पीएससी ने पीएचडी अवार्ड होने के दिन से 10 साल का अनुभव जरूरी किया था। उस समय महिला प्राध्यापक के पास यह अनुभव था। मामला कोर्ट में गया। जहां पीएससी ने शपथ-पत्र दिया था। अब सवाल यह है कि एक ही मामले में अलग-अलग नियम कैसे हो सकते हैं।

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