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26 साल में 12 वर्ष बढ़ी औसत उम्र, लाइफ एक्सपेक्टेंसी मामले में प्रदेश 24 वें नंबर पर

केंद्र सरकार के इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नवंबर में आई रिपोर्ट से हुआ है।

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2017, 06:54 AM IST
state number twenty fourth in Life Expectancy case

इंदौर. हम इस बात पर खुश हो सकते हैं कि 26 साल पहले के मुकाबले मध्यप्रदेश में औरतों का औसत जीवन काल (लाइफ एक्सपेक्टेंसी)13.7 साल और पुरुषों का 7.7 वर्ष बढ़ गया है, लेकिन लाइफ एक्सपेक्टेंसी के मामले में प्रदेश का 24 वें स्थान है। यह तथ्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी उजागर कर रहा है। यह खुलासा केंद्र सरकार के इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की नवंबर में आई रिपोर्ट से हुआ है।

- इस मामले में दूसरे राज्यों से मप्र के अंतर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहले स्थान पर खड़े केरल के मुकाबले प्रदेश के स्त्री-पुरुष करीब 9 साल कम जीते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में प्रदेश सात बीमारू राज्यों में शामिल है।

- यहां अभी भी कुपोषण, डायरिया, दुर्घटनाएं व प्रदुषण के साथ बढ़ रहे स्वास्थ्य संबंधी रोग असमय मौतों का बड़ा कारण बने हुए हैं। प्रदेश के लिए चिंता का विषय है कि अभी भी 15 की आयु से पहले होने वाली मौतों में हर तीसरे बच्चे की मौत का कारण दस्त, निमोनिया या कुपोषण है।

26 साल में बढ़े गैर संक्रामक रोग
- इन 26 सालों में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि गैर संक्रामक रोग (एनसीडी) जैसे हार्ट प्रॉब्लम, पैरालिसिस, डायबिटीज, कैंसर असमय मौतों या अक्षमता के पीछे बड़ा कारण बनकर उभरे हैं। आईसीएमआर की रिपोर्ट बताती है कि चिकित्सा सुविधाओं में सुधार के चलते पिछले 26 सालों में संक्रामक रोगों में कमी आई है। लेकिन इसके उलट लाइफ स्टाइल डिसीज के नाम से जानी जाने वाली बीमारियों ने संक्रामक रोगों की जगह ले ली है।

दुर्घटनाओं में देश में दूसरे स्थान पर
- साल 1990 में जहां संक्रमण,मातृत्व संबंधी विकार, बाल मृत्यु दर और कुपोषण के चलते होने वाली बीमारियां हर दूसरी मौत के लिए जिम्मेदार थीं। साल 1990 में गैर संक्रामक रोगों (एनसीडी)का हिस्सा 38 प्रतिशत था। साल 2016 आते-आते गैर संक्रामक रोग आधे से ज्यादा(62%) मौतों के लिए जिम्मेदार हो चुके हैं। दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों में भी मप्र तमिलनाडु के बाद देश में (12%) दूसरे स्थान पर है। वहींं बड़े शहरों में इंदौर चौथे नंबर पर है। जहां सड़क हादसों में मुंबई और कोलकाता से ज्यादा मौतें हुईं।

प्रदेश में इन कारणों से होती हैं सबसे ज्यादा मौतें

बचपन : कुपोषण, दस्त और निमोनिया

- 15 की आयु के पहले होने वाली मौतों के पीछे मुख्य वजह कुपोषण, दस्त, निमोनिया और जन्मजात विकृति है। 26 साल पहले के मुकाबले संक्रामक रोगों पर तो काफी हद तक नियंत्रण हुआ। फिर भी कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और कुपोषण असमय मौत का कारण बने हुए हैं।

युवा : हर छठी मौत की वजह सुसाइड और हिंसा

- 15 से 40 साल के आयु वर्ग में मौत का बड़ा कारण सुसाइड और हिंसा सामने आया है। दुर्घटनाएं और चोट भी मुख्य वजह है, मगर तेजी से बढ़ती लाइफ स्टाइल डिसीज जैसे हार्ट प्रॉब्लम, कैंसर, डायबिटीज कम उम्र में असमय मौत का कारण बन कर उभरे हैं।

‌‌‌‌बुजुर्ग : ह्रदय रोग, कैंसर व श्वास रोग

- 40 से 70 आयु व ज्यादा उम्र में असमय मौतों के पीछे सबसे बड़ा कारण हार्ट संबंधी विकार हैं। इसके बाद कैंसर, दस्त व श्वास रोग हैं।

पुरुषों से 4 वर्ष ज्यादा जीती हैं महिलाएं
- राष्ट्रीय व राज्यवार औसत आंकड़ों के मुताबिक औरतों की औसत उम्र पुरुषों के मुकाबले करीब 4 साल ज्यादा है। देश में महिलाएं औसत रूप से 70.3 साल जीती हैं, जबकि पुरुष 66.6 वर्ष। मप्र में भी अंतर 4 साल है। बीते 26 वर्ष में स्त्री की उम्र साढ़े 13 साल बढ़ी तो पुरुषों की 7.7 ही बढ़ी।

सबसे ज्यादा जीते हैं केरल के लोग
- एक ही देश में विसंगति का उदाहरण है केरल की महिलाओं के औसत 78.7 साल के मुकाबले उप्र की महिलाएं 12 वर्ष कम जीती हैं। पुरुषों में यह अंतर आसाम मामले में 10 साल का है। यहां केरल के 74 साल के मुकाबले यूपी,आसाम में पुरुष उम्र 64 है।

- हादसे में मरने वाले ज्यादातर युवा | सिर्फ 2015-16 में ही प्रदेश में 9646 लोग दुर्घटनाओं में मारे गए। जिनमें 5400 से ज्यादा 40 साल से कम उम्र के थे। आश्चर्यजनक रूप से इनमें करीब 600 लोगों की उम्र तो 18 साल से भी कम थी।

- एक्शन प्लान बना रहे हैं | प्रमुख सचिव स्वास्थ्य गौरी सिंह का कहना है कि हार्ट, डायबिटिज और कैंसर जैसी नॉन कम्युनिकेबल डिसीज टॉप एजेंडे में है, इसके लिए एक्शन प्लान बना रहे हैं। बड़ी संख्या में डॉक्टरों को ट्रेंड किया गया है।

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