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क्या सारी कलाओं के इंद्रधनुषी रंग खिलना बंद हो जाएंगे?

News - शहर की चित्रकार भारती सरवटे के इंस्टॉलेशंस अपनी रचनात्मकता के तमाम आयामों से यह मार्मिकता से बयां कर जाते हैं कि...

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 02:40 AM IST
क्या सारी कलाओं के इंद्रधनुषी रंग खिलना बंद हो जाएंगे?
शहर की चित्रकार भारती सरवटे के इंस्टॉलेशंस अपनी रचनात्मकता के तमाम आयामों से यह मार्मिकता से बयां कर जाते हैं कि क्या हमारे शहर में कलाओं के रंग खिलना बंद हो जाएंगे? क्या यह हमारा खूबसूरत सपना मर जाएगा? वे अपने श्वेत-श्याम और रंगीन इन्स्टॉलेशंस से यह बयां करती है कि शासकीय ललिल कला संस्थान का पुराना भवन खत्म होने के बाद क्या अब केंद्रीय अहिल्या लाइब्रेरी और प्रीतमलाल दुआ सभागृह की पार्किंग भी खत्म कर दी जाएगी।

ख्यात कवि पाश की कविता से शुरू होने वाली इंस्टॉलेशंस की यह प्रदर्शनी खूबसूरत रंगों की बानगी के साथ इस उम्मीद पर खत्म होती है कि शहर का पुष्पित-पल्लवित और हर रंग में खिलता यह कला संसार बरक़रार रहेगा। उनके ये थीम आधारित इंस्टॉलेशंस शहर के इस बड़े मुद्दे पर एक ताकतवर प्रतिरोध पैदा करते हैं और इसमें पोस्टकार्ड के इंस्टॉलेशंस के ज़रिए उम्मीद भी पैदा करते हैं।

कला का खून और काले झंडों का प्रतिरोध

भारती सरवटे ने इन इंस्टॉलेशंस को इस तरह से संयोजित किया है कि ये पार्किंग के मुद्दे को एक कहानी के जरिए अभिव्यक्त करते हैं। पहले पाश की कविता, फिर काग़ज़ के काले झंडों को लाल कपड़ों से बंधे गोल आकारों के साथ बताती हैं कि जिस तरह से इस मुद्दे पर कला-प्रेमियों की भावनाओं का खून किया गया है ठीक उसी तरह से वे काले झंडों से इसका मौन लेकिन मुखर प्रतिरोध करती हैं। इसके बाद वे पेड़ से झरते पत्तों और हवा में लटके काग़ज़ के परिंदों के जरिए बताती हैं कि इस कैम्पस से अब पेड़ उखाड़ दिए जाएंगे। परिंदों को घोंसले भी उजड़ जाएंगे। काली फ्रेम्स के जरिए बताया कि यह कैम्पस उजड़ेगा तो कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कहां करेंंगे?

मार्मिक इंस्टॉलेशंस के जरिए शहर की कलाकार भारती सरवटे ने किया इस फैसले का रचनात्मक प्रतिरोध

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना...

तड़प का न होना

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

(पाश की कविता एक अंश)

उम्मीद है आप हमारे साथ हैं

यानी कला के साथ हैं... पर्यावरण के साथ हैं... किताबों के साथ हैं...हमारी धरोहरों के साथ हैं... कविता के साथ हैं... संगीत के साथ हैं...सुंदरता के साथ हैं...चिड़िया के साथ हैं... किलकारियों के साथ हैं...

यानी ज़िंदगी के साथ हैं...

कलाकारों की उम्मीद के पोस्टकार्ड्स

इसके बाद वे चित्रकारों-संगीतकारों-फोटोग्राफर्स-कला प्रेमियों के इस मुद्दे पर लिखे गए पोस्ट कार्ड्स के जरिए उम्मीद कायम रखती हैं कि यदि शहर के कलाकारों ने एक साथ इकट्‌ठा होकर इसका विरोध किया तो संभव है यह कैम्पस बचाया जा सके। इस इंस्टॉलेशंस को इन्हीं पोस्ट कार्ड्स से मिलाकर बनाया गया है। इसके बाद वे कागज की रंगबिरंगी लड़ियों और खेलते-कूदते बच्चों के खिलौने जरिए यह बयां करती है कि यदि कला के लिए एक खूबसूरत और हराभरा सार्वजनिक स्थान बचा रहेगा और अपने पर्यावरण में धड़कता रहेगा तो इसमें एक पूरा हंसता-खेलता संसार अपनी धड़कनों और सेहत के साथ फलता-फूलता रहेगा। जाहिर है ये इंस्टॉलेशन अपने में जितने महत्वपूर्ण हैं उससे ज्यादा एक साथ मिलकर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

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क्या सारी कलाओं के इंद्रधनुषी रंग खिलना बंद हो जाएंगे?
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