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सक्सेसफुल स्टार्टअप्स ने सुनाया सफ़रनामा, यंग आंत्रप्रेन्योर्स से कहा किताबें बढ़ाती हैं हौसला

News - स्टार्टअप... कितना आम शब्द हो गया है आजकल। दिन में कई मर्तबा इसे पढ़ते-बोलते हैं हम। शुरुअात...एक सीधा-सादा शब्द...लेकिन...

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 02:40 AM IST
सक्सेसफुल स्टार्टअप्स ने सुनाया सफ़रनामा, यंग आंत्रप्रेन्योर्स से कहा किताबें बढ़ाती हैं हौसला
स्टार्टअप... कितना आम शब्द हो गया है आजकल। दिन में कई मर्तबा इसे पढ़ते-बोलते हैं हम। शुरुअात...एक सीधा-सादा शब्द...लेकिन क्या इतना आसान होता है कुछ शुरू करना। निर्माण की प्रक्रिया के सारे ज़ोखिम उठाने पड़ते हैं। ये ज़ोख़िम क्या हैं, शुरुआत करने में क्या मुश्किलें आती हैं इसी की चर्चा की गई शनिवार को हुए इवेंट ई-चाय स्टार्टअप हसल में। शहर के छह स्टार्टअप्स ने उन संघर्षों की बात की जिनकी नींव पर उनका स्टार्टअप खड़ा है। नए आंत्रप्रेन्योर्स को इन्होंने बताया कि धीरज रखते हुए बढ़ते जाने की राह में कई बार हिम्मत टूटेगी। लगेगा अब खत्म करते हैं। लगातार मोटिवेशन चाहिए। अपना सोर्स ऑफ मोटिवेशन पहचानिए। अक्सर किताबें हौसला बढ़ाती हैं। कुछ फिल्म्स हिम्मत दे जाती हैं।

ज्ञानेंद्र सिंह, अवधेश सोलंकी, कविता सिंह और प्रणव मोक्षमार ने भी अपना सफरनामा सुनाया। कुछ स्टार्टअप्स के किस्से हम पाठकों के साथ शेअर कर रहे हैं :

सात बार बैंकरप्ट हुआ, लेकिन हिम्मत नहीं हारा

सेल्फ डिपेंडेंट होने के उद्देश्य से 16 साल की उम्र में मैंने 500 रुपए में वेबसाइट बनाना शुरू किया। रिस्पॉन्स मिला तो आईटी में ही सर्विस प्रोवाइडिंग कंपनी शुरू की। एक के बाद एक सारे प्रोजेक्ट्स फेल होते चले गए। ऐसा समय आ गया कि रहने-खाने तक के पैसे नहीं थे। एफ बी पर अमेजिंग बिल्डिंग्स का पेज देखा। यूनीक डिजाइन वाले इस पेज को लाखों में लाइक्स मिले थे। मैंने भी ऐसी ही तस्वीरों और इंट्रेस्टिंग न्यूज वगैरह का पेज बनाया यह काफी हिट रहा। हालांकि 7 बार बैंकरप्ट भी हुआ। करोड़ से जीरो पर आ गया । फिर सोचा की अगर पहले हम ज़ीरो से शुरुआत कर सकते हैं तो अब क्यों नहीं। कहीं पढ़ा था मैंने सिर्फ जीने के लिए ज़िंदगी मत जियो, मरने के बाद भी ज़िंदा रहने के लिए जियो।

- परवीन सिंघल, विटीफीड

पिता ने मेरी पढ़ाई के लिए ज़मीन बेच दी

सिवनी के पास छोटा सा गांव है बगोड़ी। मैं वहीं का रहने वाला हूं। 12वीं तक की पढ़ाई मैंने यहीं से की। 12वीं के बाद पढ़ाई करने के लिए पैसे नहीं थे। बैंक लोन के बारे में भी इतनी जानकारी नहीं थी। पिताजी ने मेरी पढ़ाई के लिए अपनी ज़मीन बेच दी। मैंने कॉलेज के साथ-साथ पार्ट टाइम जॉब शुरू किया। कॉलेज ख़त्म होते तक मैं महीने के 60 हज़ार रुपए कमा लेता था। मैं अपने गांव का पहला इंजीनियर था। मैंने सोचा मेरे पिता ने मेरे लिए अपनी ज़मीन, अपनी रोज़ी-रोटी का ज़रिया बेच दिया और मैं औरों की ही तरह एक साधारण नौकरी कर रहा हूं? किस तरह मदद कर सकूंगा परिवार की। इसलिए मैंने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर एक आईटी कंपनी शुरू की। बहुत रुकावटें आईं। हिम्मत टूटी भी लेकिन तीनों में से किसी न किसी ने बाकी दोनों को संभाल लिया। आज हम सफल हैं।

- प्रशांत पटेल, मैनेजिंग डायरेक्टर ऑफ क्रियटो वेब

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