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कस्बाई रंग लिए आए लोककलाकार

लालबाग में यशवंतराव होलकर महोत्सव की शुरुआत हुई है। गुजरात के शिल्पकार यहां खूबसूरत हैंडीक्राफ्ट लाए हैं।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 03:15 AM IST

कस्बाई रंग लिए आए लोककलाकार
लालबाग में यशवंतराव होलकर महोत्सव की शुरुआत हुई है। गुजरात के शिल्पकार यहां खूबसूरत हैंडीक्राफ्ट लाए हैं। मिट्टी, लकड़ी, जूट और बांस से बनी वो कृतियां जो मॉल्स में नहीं मिलतीं। शनिवार शाम लोककलाकारों ने यहां सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। घूमर, कालबेलिया, चिरमी, मंजीरा, भवई और यूपी के मयूर नृत्य की पेशकश भी दी गई।

लोक संगीत और लोक कलाओं की सबसे बड़ी खूबी है उनकी सादगी। रीति रिवाज़ों, रिश्तों, तीज त्योहारों ब्याह की रस्मों और गांव की चौपालों पर होती बतकहियों का ज़िक्र मलता है इनमें। खेत-खलिहान महकते हैं इन गीतों में। कार्यक्रम का व्यवस्थित प्रचार नहीं किया गया लेकिल शनिवार होने से दर्शक अच्छी तादाद में आ गए।

शिल्पकला भी देखिए

गुजरात में की जाने वाली नक्काशी का इतिहास 15वीं शताब्दी में मिलता है। लकड़ी का जालीदार काम, मूर्तिकला और काथा वर्क मशहूर है। लालबाग में 25 अप्रैल तक चलने वाले इस समारोह में गुजरात के 80 शिल्पकार नायाब कारीगरी के नमूने लाए हैं। गुजराती कढा़ई के नमूने भी देखिए यहां।

भवाई : ममता मालवीय नामी भवाई कलाकार हैं। उन्होंने सुंदर प्रस्तुति दी। उनकी सबसे बड़ी खूबी है ऊर्जा का संतुलित इस्तेमाल। भवई राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। इसमें करतब दिखाने पर अधिक ज़ोर दिया जाता है। जैसे सिर पर सात आठ मटके रखकर नाचना। गिलास में से नोट उठाना। आग के करतब दिखाना। तलवार की धार पर भी भवई करते हैं लोक कलाकार।

मंजीरा : मंच पर कलाकारों की संख्या कम होने से इस प्रस्तुति के फॉर्मेशन उतने सुंदर नहीं बन सके। पढर कम्यूनिटी का लोकनृत्य है मंजीरा। इसमें मंजीरे बजाते कलाकार घेरा बनाकर बैठते- उठते, चक्कर लेते और फुगड़ी खेलते हैं। राजस्थान में इसे तेरा ताल भी कहते हैं।

घूमर : शनिवार को हुई प्रस्तुतियों में घूमर बसे आकर्षक रहा। कलाई का लोच और कमर के संतुलित संचालन बहुत सुंदर लग रहा था। राजस्थान का लोकनृत्य है घूमर जिसका विकास भील कबीले ने किया था। बाद में राजपूत स्त्रियां भी इसे करने लगीं। घूमर सिर्फ स्त्रियां करती हैं। चक्कर लगाते हुए विशेष शैली में हाथों का संचालन मनोहारी था।

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