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जीवन के छंद की, फागुन के रंग की कविताएं सुनाई

खूबसूरत चित्रों के बीच ये जीवन के छंद की रचनाएं थी। फागुन में रंगों की मरुस्थल में पुष्प महकने की कविताएं थी।...

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 03:25 AM IST
खूबसूरत चित्रों के बीच ये जीवन के छंद की रचनाएं थी। फागुन में रंगों की मरुस्थल में पुष्प महकने की कविताएं थी। इसमें जीवन की आशा थी तो उत्सव का उत्साह था। ये कविताएं प्रीतमलाल दुआ सभागृह में चित्र-प्रदर्शनी के तहत की गई काव्य गोष्ठी में सुनाई गई। इसमें शहर के चुनिंदा कवियों और कवयित्रियों ने छंदबद्ध और छंदमुक्त कविताओं का पाठ किया।

काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार हरेराम वाजपेयी ने एक हास्य क्षणिका सुनाने के बाद गीत सुनाया जिसके बोल थे : कौन किसका साथ देता, सांस तक अपनी नहीं, मांगने पर ज़िंदगी क्या, मौत तक मिलती नहीं। संतोष मोहंती दीप ने छंदबद्ध कविता सुनाई जिसमें जीवन का छंद था : जीवन जैसे यह अनमोल मिला है, मरू में जैसे इक पुष्प खिला है, अंकों में आंकों मत इसको, अंकों में जीवन फिसला है।

स्वप्न सजीले हो गए झरे गुलाबी रंग

दो कवयित्रियों ने फागुन और होली को लेकर कविताएं सुनाई। अंजुल कंसल ने कविता सुनाई : तन से हम फागुन हुए, मन से सतरंग स्वप्न सजीले हो गए झरे गुलाबी रंग। सुधा चौहान कविता पढ़ी : महफिल में आ गए हैं तुम्हारे कहने पर, लगा लिया है रंग तुम्हारे कहने पर। इसी भाव भूमि पर आशा जाखड़ ने कविता सुनाई : आज होली खेलें अपने आंगन में, रंगों का त्योहार मनाए फागुन में। इसके बाद राकेश जैन ने रचना सुनाई : इंतज़ार सदियों का लम्हों की मुलाकात, अफसाने ज़माने भर के, अधूरी दिल की बात। इसके अलावा प्रदीप नवीन, रमेश जैन, मुकेश इंदौरी, अशोक द्विवेदी, विनीता सिंह चौहान और आशा जाकड़ ने भी रचनाएं सुनाईं। अध्यक्षता अरविंद ओझा ने की और संचालन हरेराम वाजपेयी ने किया।

प्रीतमलाल दुआ सभागृह में काव्य गोष्ठी की गई