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गुरु की स्मृति में दो शिष्यों ने दी सच्ची स्वरांजलि

पुणे के शास्त्रीय गायक रघुनंदन पणशीकर ने राग भूप गाया। सिटी रिपोर्टर | इंदौर हिंदु्स्तानी शास्त्रीय संगीत की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 03:30 AM IST

गुरु की स्मृति में दो शिष्यों ने दी सच्ची स्वरांजलि
पुणे के शास्त्रीय गायक रघुनंदन पणशीकर ने राग भूप गाया।

सिटी रिपोर्टर | इंदौर

हिंदु्स्तानी शास्त्रीय संगीत की ख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोणकर की स्मृति में आयोजित पहले गान सरस्वती संगीत समारोह की यह वैशिष्ट्य था कि उसी जयपुर-अतरौली घराने के दो गायक-गायिकाओं के गायन से समारोह की सुरों से आराधना की गई। इसमें न केवल सुरों के प्रति सच्चा लगाव था बल्कि वह पक्की रागदारी भी थी जो तपते माहौल को शीतलता दे गई। रवीन्द्र नाट्य गृह में पुणे के शास्त्रीय गायक रघुनंदन पणशीकर ने राग भूप को बहुत इत्मीनान और तबियत से गाया तो वरिष्ठ गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे ने खेम कल्याण गाकर अपनी गुरु को सच्ची स्वरांजलि अर्पित की।

प्रथम सुर साध

इसके पहले पुणे के शास्त्रीय गायक रघुनंदन पणशीकर ने राग भूप को तबियत से गाया। लगभग एक घंटे में उन्होंने राग को प्रस्तुत करते हुए मींड, गमक और तानों का सुंदर और कल्पनाशील इस्तेमाल किया। विलंबित में उन्होंने बंदिश गाई प्रथम सुर साध, जब होवत ज्ञान गाई और द्रुत में बंदिश आ रे सहेला रे मिल गाएं, सप्त सूरन के भेद सुनाएं, जनम जनम को संग ने भूलें अबके मिले तो बिछुड़ ना जाएं। समापन उन्होंने राग झिंझोटी में बंदिश हे शिवगंगाधर से किया। इस रसपूर्ण गायन में उनके साथ तबले पर हितेंद्र दीक्षित और हारमोनियम पर डॉ. विवेक बंसोड़ ने संगत की।

खेम कल्याण में गुरु का सुरीला स्मरण

अपने गायन की शुरुआत करने के पहले अश्विनी भिड़े देशपांडे ने कहा कि किशोरी ताई मेरे लिए ईश्वर की तरह है और मैंने उनकी और उनके संगीत की ईश्वर की तरह ही आराधना की है। मैंने उनकी संगीत दृष्टि को अपनी मां की दृष्टि से देखा है। मैंने उनके संगीत को सुन सुनकर उनके जैसा गाने के बजाय उनके संगीत के आधारभूत सिंद्धांतों को मानकर गायन किया है। आज मैं उन्हीं का स्मरण कर उनके गाए राग खेम कल्याण को गा रही हूं और यह राग उनसे अद्धा ताल में सुना था और यह मैंने किसी दूसरे कलाकार से नहीं सुना। और जब उन्होंने इस राग में बंदिश गाना शुरू किया तो उनके सच्चे सुर और सुरों के प्रति गहरा आत्मीय लगाव बता रहा था कि घराने में रहते हुए, अपने गुरुओं को याद करते हुए अपनी गायन शैली से कैसे रागदारी संभव की जा सकती है। इस बंदिश के बोल थे बालमवा तुम बिन रैन। इस बंदिश को उन्होंने तन्यमता से गाया और फिर द्रुत में सदारंग की बंदिश गाई : पिहरवा। इसमें उनके रसपूर्ण गायन के सभी कायल हो गए। तानपुरे पर उनकी शिष्या पूर्वी निमगांवकर ने उनका साथ दिया और उन्हें सराहा भी गया। समानप उन्होंने कबीर के भजन कछु कहे मनवा लागा से किया। तबले पर यति भागवत ने ठहरावभरी संगत की और हारमोनियम पर सिद्धेश बिचौलकर ने संगत की। संचालन केशव परांजपे ने किया।

शास्त्रीय गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे ने राग खेम कल्याण प्रस्तुत किया

फोटो : संदीप जैन

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