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सब इत्र लगा कर बैठे हैं, मैं ग़ज़ल छिड़क कर आया हूं

रविवार को एक कैफे में इनसाइड आउट पोएट्री ओपन माइक रखा गया जिसमें 20 प्रतिभागियों ने अपने जज्बात शब्दों की माला में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 02, 2018, 03:30 AM IST

सब इत्र लगा कर बैठे हैं, मैं ग़ज़ल छिड़क कर आया हूं
रविवार को एक कैफे में इनसाइड आउट पोएट्री ओपन माइक रखा गया जिसमें 20 प्रतिभागियों ने अपने जज्बात शब्दों की माला में पिरोए। किसी ने सिस्टम के ख़िलाफ़ उफनते गुस्से को, तो किसी ने अपने प्यार के उमड़ते सैलाब को लफ्जों में बयां किया। चुनिंदा कविताएं हम शेअर कर रहे हैं :

क्या कल कोई नया आफ़ताब निकलेगा?/ जो आज मोमबत्तियां जला आये हो/ क्या अब "निर्भया" भयमुक्त रहेगी? / जो तुम मोमबत्तियां असंख्य जला आए हो/ क्या चौराहे पे श्रद्धांजलि देकर/ पिछली गली का अपराध रोक सकोगे/ क्या कुछ लंबे नारे दे कर, उन्हें बदल सकोगे?/ अरे ये तो मोमबत्तियां है कुछ छड़ जलेगी फिर बुझ जाएगी/ क्या ऐसे उन मनचलों को सुधार सकोगे?/अब बदलाव की ज्वाला भड़क चुकी है तो सुनो/ अपने अंदर का दानव दूर करो/ खुद में और लोगों में जब सुधार दिखेगा, जब एसिड फेकने वाला लफंगा चौराहे पे पीटा जाएगा/ तब पुरुषप्रधान ये देश सुरक्षित रहेगा,

रविवार को एक 56 दुकान स्थित एक कैफे में ओपन माइक हुआ, युवाओं ने कविताओं में कही दिल की बात

ये दृश्य देख चौराहे पे जलती मोमबत्तियां चैन की नींद सो जाएंगी/ कोई बच्ची फिर कभी कोचिंग जाने से न घबराएगी। 

- ऋषभ पांडेय

श्रृंगार के इस दौर में, काफिया सजा कर आया हूं/ सब इत्र लगा कर बैठे हैं, मैं ग़ज़ल छिड़क कर आया हूूं। 

- देवव्रत दुबे

तू एक बार कहती तो हद से गुजर जाता मैं/तेरी ख़ुशी की खातिर सारे वादों से मुकर जाता मैं/ इतनी तकलीफ उठाने की जरूरत क्या थी/ तू एक बार फिर मुस्कुरा देती फिर बिखर जाता मैं। 

- देवेन्द्र पांडेय

मंज़िल का पता नहीं बस सफ़र अच्छा लगता है/प्यार में ज़ख्म ज़ुल्म ज़हर सब अच्छा लगता है। कल तक अनजान थे इंदौर की जिन गलियों से आज जाना पहचाना मेरी मुहब्बत का शहर लगता है।  - पंकज कविराज

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