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सफरनामा में सुनाए स्वाद और शहरों के अनूठे क़िस्से

सिटी रिपोर्टर | इंदौर यह एक ऐसा सफरनामा था जिसमें शहर के चुनिंदा लोगों ने अपने सफर की दिलचस्प कहानियां ही साझा...

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 03:30 AM IST
सिटी रिपोर्टर | इंदौर

यह एक ऐसा सफरनामा था जिसमें शहर के चुनिंदा लोगों ने अपने सफर की दिलचस्प कहानियां ही साझा नहीं की बल्कि उन कहानियों से मिली सीख भी बताई। इस तरह इस सफरनामा ने मनोरंजन ही नहीं किया कुछ अर्थपूर्ण बातें भी बताई। एक कैफे में इस सफरनामा के तहत आलोक दुबे और रवि प्रताप सिंह ने अपने किस्से बताई उन्हें यहां साझा किया जा रहा है।

दूसरों को कोसे बिना अपना काम करते चलो : वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर आलोक दुबे किस्सा बयां करते हुए कहते हैं मैं एक शहर की यात्रा के दौरान मंदिर के सामने एक पुल था। उस पुल की शुरूआत में ही एक बड़ा गड्‌ढा था। मैं जब म्ंदिर में दर्शन कर लौटा तो देखा एक बूढ़ा-बूढ़ी उस गड्ढे को भर रहे थे। पूछने पर उन्होेंने इतनाभर बताया कि भइया ये हमारा काम नहीं है। हम तो केवल मजदुर हैं। चार दिन पहले यहां एक बाइक वाले को इस गड्ढे गिरने से गहरी चोटें आई थी। इसलिए हमने ऐसा सोचा की इस शहर के नागरिक होने के नाते हम इस गड्ढे को भर दें। इस घटना से मैंने यह सीखा कि दूसरों को कोसने के बजाय हमें आप अपना कर्तव्य निभाते जाना चाहिए।

रवि प्रताप सिंह राणावत

फौज के लिए बनाई जाती थी दाल-बाटी

फूड क्यूरेटर रवि प्रताप सिंह राणावत बताते हैं कि दाल-बाटी मेवाड़ की है। मेवाड़ के राजा बप्पा रावल की फ़ौज के लिए ऐसे व्यंजन तैयार किए जाते थे। राजा-महाराजा के समय के ऐसे बहुत सारे व्यंजन हैं जो अब भूला दिए गए हैं। एक बार एक राजा ने दूसरे राज्य के राजा को भोजन पर बुलाया। इस मौके पर उन्होंने अन्य राज्यों के अलग-अलग व्यंजन बनाए। इसलिए राजा ने रामपुर के खानसामों को अपने राज्य आने और व्यंजन बनाने का न्योता दिया। रामपुर के महाराज तोल कर सामग्री लेते थे और उससे व्यंजन बनाने के बाद फिर तोलते थे। इस तरह इन्होने रामपुर के खानसामों से व्यंजन की सामग्री और मात्रा दोनों का अंदाजा लगा लिया। और बाद में प्रयोग कर उनके व्यंजन भी तैयार कराए। इस तरह एक व्यंजन दूसरे जगह पहुंचे और लोकप्रिय हुए।