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लॉजिक होगा तो ही समझेंगे युवा, दबाव डालेंगे तो वे कतराने लगेंगे

यह पहली बार है जब स्मार्ट गर्ल का प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के अलावा किसी अन्य राज्य में शुरू हुआ है। यह प्रोजेक्ट एक...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 03:40 AM IST
लॉजिक होगा तो ही समझेंगे युवा, 
 दबाव डालेंगे तो वे कतराने लगेंगे
यह पहली बार है जब स्मार्ट गर्ल का प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के अलावा किसी अन्य राज्य में शुरू हुआ है। यह प्रोजेक्ट एक प्रयास है लड़कियों को बदलते ज़माने के मुताबिक चलना सिखाने का। मुश्किलों से लड़ते जाना और आशावादी दृष्टिकोण रखना सिखाने की कोशिश है। डीएवीवी में गुरुवार से यह वर्कशॉप शुरू हुई। इसमें शहर के कॉलेजेस की 100फैकल्टी ने हिस्सा लिया। ये टीचर्स स्टूडेंट्स को ट्रेनिंग देंगे। गुरुवार को आईआईपीएस में हुई वर्कशॉप में स्मार्ट गर्ल प्रोजेक्ट के स्पीकर प्रफुल्ल पारख ने सेशन लिया। उन्होंने कहा "यकीनन परेशानियां हैं, 8 माह की बच्ची से लेकर 80 साल की महिला भी सुरक्षित नहीं है। रेप, एसिड अटैक, किडनैपिंग तमाम तरह के क्राइम हो रहे हैं... लेकिन बावजूद इसके ज़िंदगी खूबसूरत है, और बेटियों को इसका अहसास कराना ही हमारी जिम्मेदारी है। हम उन्हें सतर्क करें, लेकिन नकारात्मकता न आए। इसी माहौल में रहते हुए उन्हें सुरक्षा कवच देना ही स्मार्ट गर्ल प्रोजेक्ट का मकसद है।

स्मार्ट गर्ल किताब का विमोचन किया गया

बेटियों को योग्य निर्णय ले पाने के लिए तैयार करने, उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत करने और संतुलित विकल्पों काे चुनने जैसे अहम उद्देश्य के साथ शुरू हुई इस स्मार्ट गर्ल वर्कशॉप। इसके तहत फैकल्टीज़ की यह ट्रेनिंग तीन चरणों में 31 मार्च तक पूरी होगी। जिसके अगले चरण में ये 50 मास्टर ट्रेनर्स 280 कॉलेजों में 1000 ट्रेनर्स को ट्रेनिंग देंगे, और अाखिर में ये ट्रेनर्स अपने-अपने कॉलेज में 50-50 छात्राओं की वर्कशॉप लेंगे। वर्कशॉप में भारतीय जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरेंद्र जैन, कुलपति डॉ. नरेंद्र धाकड़ ने स्मार्ट गर्ल पुस्तक का विमोचन भी किया।

मास्टर ट्रेनर्स बात-बेबात टोकें नहीं स्टूडेंट्स को

प्रफुल्ल ने कहा पेरेंट्स और बच्चों में विचारों का एक बहुत बड़ा अंतर है। वो इसलिए कि पेरेंट्स अपनी अपेक्षाएं या अधूरे सपने, बच्चों के ज़रिए पूरे करना चाहते हैं। वह भी उसकी इच्छा जाने बगैर। वहीं पैरेंट्स यही बात बच्चों से या तो निगेटिवली करेंगे या दबाव डालकर। लेकिन यदि बच्चों से लॉजिक के साथ बात करेंगे तो यह जनरेशन एक्सेप्ट करेगी। यह बात पेरेंट्स को समझना होगी। उन्होंने मास्टर ट्रेनर्स से कहा कि वे पेरेंट्स की जगह न लें। उन्हें बात बेबात टोकें नहीं। यदि ऐसा करेंगे तो लड़कियां आप से कतराने लगेंगी और मकसद अधूरा रह जाएगा। आपको लड़कियों को इस तरह तैयार करना है।

प्रोजेक्ट ऑब्जेक्टिव्स

1. चुनौतियां : सामाजिक के साथ पारिवारिक चुनौतियों के लिए तैयार रहें। लड़कियों के सामने कई बार उनके अपने भी खड़े हो जाते हैं। समझदारी और धैर्य से काम लेना सिखाएं।

2. फैसले : जोखिम भरे निर्णय लेने के बजाय विवेकशीलता से सही राह चुनना सिखाएं। इंसान अपने फैसलों से बनता है। एक ग़लत फैसला जीवन की दिशा बदल देता है।

3. आत्मसम्मान : बच्चियों को ऐसे वाकए सुनाएं जिससे उनका आत्मसम्मान बढ़े। वे स्त्री होने पर गौरवान्वित हों। यह बहुत ज़रूरी है। इसका असर उनके दृष्टिकोण पर पड़ेगा जो आगे चलकर पूरे जीवन को प्रभावित करेगा।

4. आशा : नकारात्मक संवाद न करें। उन्हें घटनाओं से सतर्क तो करना है लेकिन आपकी भाषा और लहजा संतुलित हो। वरना सामाजिक विसंगतियों के प्रति अनावश्यक भय पैदा होने लगेगा उनके मन में।

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