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7 साल पुराने निगम के यातायात घोटाले में 2 इंजीनियर सहित 4 पर लोकायुक्त केस

लोकायुक्त पुलिस ने सात साल पहले नगर निगम में हुए यातायात घोटाले में निगम के दो कार्यपालन यंत्रियों और करोड़ों का...

Danik Bhaskar

Mar 01, 2018, 04:45 AM IST
लोकायुक्त पुलिस ने सात साल पहले नगर निगम में हुए यातायात घोटाले में निगम के दो कार्यपालन यंत्रियों और करोड़ों का भुगतान लेने वाली दो फर्मों के मालिक पति-प|ी के खिलाफ पद के दुरुपयोग और षड्यंत्र रचने के मामले में भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की है। आरोपियों ने यातायात के लिए लगने वाली सामग्री मौजूद होते हुए उनकी खरीदी के लिए टेंडर निकाले थे। बाद में जो सामग्री जहां लगाना बताई वह वहां लगाई ही नहीं गई थी। टेंडर दो करोड़ रुपए का था किंतु समय पर भुगतान नहीं हुआ और विवादों के बीच निगम को लगभग साढ़े छह करोड़ का भुगतान करना पड़ा। हालांकि पूरे मामले में राठौर का नाम ही आना चौंकाने वाला है, क्योंकि घोटाला पहले ही हो चुका था और राठौर पहले भी इस बात के दोषी पाए गए थे कि उन्होंने कोर्ट में जवाब देने में देरी की थी। कुछ और भी बड़े अफसरों के नाम पहले हुई शिकायत में थे, जो अभी केस में नहीं है।

लोकायुक्त एसपी दिलीप सोनी के मुताबिक तत्कालीन सिटी इंजीनियर व वर्तमान कार्यपालन यंत्री अशोक राठौर, कार्यपालन यंत्री दिलीपसिंह चौहान, रजत सेल्स के मालिक राजेश जैन, उनकी प|ी और रोचक इंडस्ट्रीज सेल्स कार्पोरेशन लोधीपुरा की मालिक प्रिया जैन, निगम ऑडिटर (जिसका नाम अभी स्पष्ट नहीं हुआ है) पर केस दर्ज किया है।

यह था मामला

साल 2010-11 और 2011-12 में निगम यातायात प्रकोष्ठ ने रजत सेल्स कार्पोरेशन को शहर में मार्ग संकेतक, स्पीड बाॅम, रोड स्टंट एवं व्हाइट पट्टे लगाने का टेंडर मंजूर किया था। शिकायत पर प्रारंभिक जांच में पता चला कि जो सामग्री निगम के स्टोर में मौजूद थी, उसका भी टेंडर निकाला। साथ ही जो सामग्री जहां बताई गई वह वहां नहीं पाई गई। साथ कई ऐसी सामग्री जो पहले से लगी हुई थी, उसे भी टेंडर में शामिल किया गया और उसे भी लगाना बताया। जांच में पाया गया कि संबंधित फर्मों के मालिकों को सांठगांठ के चलते निगम के उक्त दोनों आरोपी इंजीनियरों और अन्य संबंधितों ने पद का दुरुपयोग करते हुए भुगतान की स्वीकृति जारी की।

पूर्व आयुक्त ने रोका था भुगतान, ऐसे चली कानूनी प्रक्रिया

लोकायुक्त इंस्पेक्टर विजय चौधरी के मुताबिक गड़बड़ियों की शिकायत पर 28 मार्च 2012 को तत्कालीन निगम आयुक्त योगेंद्र शर्मा ने भुगतान रोकने के आदेश दिए थे। इसके खिलाफ दोनों कंपनियों के मालिकों ने ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी। वहां से भी भुगतान के आदेश दिए गए। इस आदेश के खिलाफ निगम ने सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी अपील की लेकिन निगम को भुगतान के लिए ही कहा गया।

इसलिए तीन गुना ज्यादा भुगतान करना पड़ा

मामला अदालतों में गया जहां सुनवाई में विलंब हुआ। इससे भुगतान में देरी हुई। इस कारण दो करोड़ के बदले साढ़े छह करोड़ रुपए का भुगतान करना पड़ा।

इन अधिकारियों पर भी घोटाले का आरोप

एमआईसी सदस्य राजेंद्र राठौर ने मामले की शिकायत की थी। इसमें पूर्व सिटी इंजीनियर एनएस तोमर, पूर्व लेखाधिकारी राजकुमार त्रिपाठी, तत्कालीन यातायात प्रभारी ज्ञानेंद्र सिंह जादौन, पूर्व निगमायुक्त राकेश सिंह, योगेंद्र शर्मा के लिए भी कहा था कि इनके ध्यान न देने से ही घोटाला हुआ। राठौर ने कहा कि पहले जो अधिकारी थे, उनके किसी के भी नाम अब तक नहीं हैं। मुझे बुलाया जाएगा तो वह नाम बताऊंगा। जानकारी के मुताबिक इस मामले में भोपाल लोकायुक्त में भी पूर्व आयुक्त योगेंद्र शर्मा, एओ रहे त्रिपाठी सहित कुछ अन्य के बयान हो चुके हैं।

अफसरों से राशि वसूलने का कोर्ट दे चुका आदेश

हाई कोर्ट ने जुलाई 2014 में काउंसिल के आदेश को सही बताते हुए नगर निगम की याचिका खारिज कर दी। कहा कि अतिरिक्त राशि की वसूली अधिकारियों के वेतन से की जाए।

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