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आज की पीढ़ी प्रैक्टिकल हो गई है, उनके लिए हर रिश्ता एक सीढ़ी की तरह है, लेकिन मां-बाप सीढ़ी नहीं हैं

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 04:50 AM IST

फिल्म में एक पिता

जमाना बदल गया है। जिंदगी बदल गई है। हमारी उम्र के लोग याद करें कैसे बेकार के रिश्तों-बंधनों मंे उलझे रहते थे हम। बाप के चेहरे में ईश्वर देखते थे हम। मां के चरणों में स्वर्ग दिखाई देता था... आज की पीढ़ी बड़ी होशियार और प्रैक्टिकल हो गई है। उनके लिए हर रिश्ता एक सीढ़ी की तरह है, जिस पर पांव रख वो आगे निकल जाते हैं... और जब उस सीढ़ी का इस्तेमाल नहीं रहता है तो उसे घर के टूटे कुर्सी-मेज, टूटे-फूटे बर्तन, फटे-पुराने कपड़े, कल के अखबार की तरह रद्दी समझकर कबाड़खाने में फेंक देते हैं... लेकिन मां-बाप किसी सीढ़ी के पहले पायदान नहीं होते। मां-बाप जिंदगी के पेड़ की जड़ें हैं। पेड़ कितना ही बड़ा और हरा-भरा क्यों न हो जाए, जड़ काटने से वो हरा-भरा नहीं रह सकता। इसलिए आज बड़ी विनम्रता और आदर से मैं पूछता हूं कि जिन बच्चों की खुशियों के लिए एक बाप अपनी मेहनत की पाई-पाई हंसते-हंसते उन पर खर्च कर देता है, वो ही बच्चे जब बाप की आंखें धुंधली हो जाती हैं तो उन्हें कतराभर रोशनी देने से क्यों कतराते हैं? एक बाप अपने बेटे की जिंदगी का पहला कदम उठाने में उसकी मदद कर सकता है तो वही बेटा अपने बाप के आखिरी कदम उठाने में उसे सहारा क्यों नहीं दे सकता? जिंदगीभर अपने बच्चों पर खुशियां लुटाने वाले मां-बाप को किस जुर्म में आंसुओं और तन्हाई की सजा सुना दी जाती है? क्या इसी दिन के लिए इंसान औलाद मांगता है? इसी दिन के लिए? औलाद शायद यह भूल गई है कि जो हमारा आज है, वह कल उनका होगा। अगर आज हम बूढ़े हैं तो कल वो भी बूढ़े होंगे। जो सवाल आज हम कर रहे हैं, वही सवाल वह कल पूछेंगे।’

फिल्म बागबान में उपेक्षित पिता की भूमिका में अमिताभ बच्चन की कही पंक्तियां... जो पिछले एक महीने से इंदौर में सामने आ रहे मामलों को देखते हुए प्रासंगिक हंै।

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Web Title: आज की पीढ़ी प्रैक्टिकल हो गई है, उनके लिए हर रिश्ता एक सीढ़ी की तरह है, लेकिन मां-बाप सीढ़ी नहीं हैं
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