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आम आदमी ग्रोथ मोड में नहीं, वो रोटी कपड़ा मकान के लिए लड़ रहा

अंशु गुप्ता अपने एनजीओ गूंज के ज़रिए भारत के 23 राज्यों में काम कर रहे हैं। सड़कें-पुल बना रहे हैं, तालाबों की सफाई कर...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:15 PM IST

अंशु गुप्ता अपने एनजीओ गूंज के ज़रिए भारत के 23 राज्यों में काम कर रहे हैं। सड़कें-पुल बना रहे हैं, तालाबों की सफाई कर रहे हैं, कुएं खोद रहे हैं। पिछले 10 सालों से ज़रूरतमंदों को तन ढंकने के लिए वे कपड़े उपलब्ध करा रहे हैं। हर महीने उनकी संस्था 80 से 100 टन कपड़े बांटती है। हाल ही में उड़ीसा के एक गांव में उनकी संस्था ने 170 किलोमीटर की सड़क बनवाई।

आईआईएमसी से पत्रकारिता कर चुके और इकोनॉमिक्स में पोस्ट ग्रेजुएट अंशु की कहानी प्रेरक तो है ही, दिलचस्प भी है। पढ़ाई के दौरान सोशल वर्क जारी था। डेड बॉडी कलेक्ट करने एक बार वे खूनी दरवाज़ा गए। वहां देखा कि कड़ाके की ठंड में वो व्यक्ति सूती कमीज़ पहने हुए था। उन्हें अहसास हुआ कि कपड़ा ज़िंदगी की ज़रूरत है। यह घटना कई साल बाद भी उन्हें याद रही और जब उन्होंने एनजीओ शुरू किया तो उन्होंने क्लॉथ फॉर वर्क प्रोजेक्ट चलाया जिससे वे हर साल 1000 टन कपड़े गरीबों में बांट रहे हैं। अंशु का मानना है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम असल मुद्दों को पहचान नहीं पा रहे हैं। जानिए अलग अलग मसलों पर क्या है उनकी सोच :

रैमन मैग्सेसे अवॉर्ड विनर अंशु गुप्ता 2 फरवरी से होने वाले आईएमए कॉनक्लेव में शामिल होंगे, पढ़िए उनसे बातचीत

2 फरवरी से होने वाले आईएमए कॉनक्लेव में शामिल होंगे अंशु गुप्ता।

युवा : आधा दिन गूगल पर बिताने वाले युवा जानते ही नहीं देश के असल मुद् और परेशानियां क्या हैं

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि युवा देश की ज़मीनी परेशानियों से अनभिज्ञ है। वो टेकसैवी है, आधा दिन गूगल पर बिताता है, अमेरिका में मौसम कैसा है जानता है, लेकिन श्रीनगर में क्या चल रहा है उसे नहीं पता। गांवों का जीवन कैसा है वो नहीं जानता। एमबीए करने वाले युवाओं के लिए रूरल इंडिया एक मार्केट से ज्यादा कुछ नहीं। वे कभी अपनी मेड से बात करें, रिक्शा वाले से संवाद करें। हिंदुस्तान की असल मुसीबतें समझ आ जाएंगी।

शिक्षा : बच्चा अब आठवीं पास ही पैदा होता है

आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं करेंगे। कहते हैं बच्चे प्रेशर में आ जाते हैं। अब बच्चे आठवीं पास ही पैदा होते हैं। और फिर नौवीं में औंधे मुंह गिरते हैं। क्योंकि नींव कमज़ोर ही रह गई। एक और बड़ी ख़ामी यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने हमारे बच्चों को अपनी ज़मीन, पेड़ पहाड़ प्रकृति से प्रेम करना नहीं सिखाया। 12वीं में मेरा एक्सीडेंट हो गया था। पैर पूरा चोटिल हो गया। डॉक्टर ने चल नहीं सकेगा कभी। सरकारी डॉक्टर को 400 रुपए देना पड़ते थे ऑपरेशन से पहले। मेरे पिता ने मना कर दिया। डॉक्टर ने कहा लड़का मर जाएगा। पिता ने कहा हमारी किस्मत, लेकिन रिश्वत तो मैं नहीं दूंगा। अहसानमंद हूं मैं उनका। वरना आज रिश्वत के पैरों पर खड़ा होता। शिक्षा के साथ ऐसे संस्कार भी ज़रूरी हैं।

समाज : जो लोग रोटी को तरस रहे, वो अन्याय के खिलाफ क्या बोलेंगे

समाज असल में ग्रोथ के मोड में है ही नहीं। वो सर्वाइवल मोड में है। हमारे माता-पिता वाली पीढ़ी जीने के संघर्ष में ही लगी रही। कैसे बच्चे अच्छा पढ़ लें। किसी तरह एक घर बना लें। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी यही संघर्ष कर रहा है। जो समाज रोटी कपड़ा मकान में ही उलझा है वो अन्याय पर सवाल कैसे करेगा। आम आदमी कहीं न कहीं उलझा रहे यही तो सरकारें कर रही हैं सालों से।

पलायन : दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपने जल-जंगल-ज़मीन पर काम नहीं कर रहे

माइग्रेशन देश की बड़ी समस्या है। 5 हज़ार रुपए गर गांव के आदमी को गांव में ही दे दें तो वो शहर क्यों आएगा। शहर में तो इस कीमत में उसे छत तक नहीं मिलेगी। बड़ा दु:खद है कि हम अपनी ज़मीन पर काम नहीं कर रहे, गांव के पानी पर काम नहीं कर रहे। भारत ड्राय कंट्री नहीं है। हमारे यहां प्रॉब्लम वॉटर नहीं वॉटर मैनेजमेंट है। गांव की प्रॉब्लम गांव में हल कर देंगे तो शहरों की समस्याएं भी कम होंगी। -शेष पेज 16 पर

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