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बच्चों के मुताबिक बनाया जाना था एजुकेशन सिस्टम लेकिन हम बच्चों को सिस्टम के मुताबिक बनाने लगे

शहर में कुछ परिवार हैं जिन्होंने बच्चों का स्कूल छुड़वा दिया है और घर में पढ़ा रहे हैं। होम स्कूलिंग को अभी ट्रेंड तो...

Dainik Bhaskar

Sep 10, 2018, 03:51 AM IST
Indore - बच्चों के मुताबिक बनाया जाना था एजुकेशन सिस्टम लेकिन हम बच्चों को सिस्टम के मुताबिक बनाने लगे
शहर में कुछ परिवार हैं जिन्होंने बच्चों का स्कूल छुड़वा दिया है और घर में पढ़ा रहे हैं। होम स्कूलिंग को अभी ट्रेंड तो नहीं कह सकते लेकिन शहर में कई लोग ऐसे हैं जो “अव्वल नंबर आने’ के बजाय “सीखने’ को तरजीह दे रहे हैं। बच्चों पर असाइनमेंट्स, होमवर्क, प्रोजेक्ट और एग्ज़ाम का तनाव उन्हें खल रहा है। लिहाज़ा वो होम स्कूलिंग और अनस्कूलिंग जैसे कॉन्सेप्ट्स पसंद कर रहे हैं। इन्हीं विषयों पर रविवार को शहर में अस्माकम ग्रुप द्वारा सेमिनार कराया गया। एजुकेशनिस्ट तुषार ताम्हड़े ने कहा - बच्चे को सीखने के लिए सही वातावरण की ज़रूरत है। स्कूल इसमें असफल साबित हो रहे हैं। बेशक वे अव्वल भी आ रहे हैं और बड़ी-बड़ी एग्ज़ाम्स भी क्रैक कर रहे हैं लेकिन सीखने अैर अव्वल आने में बहुत फ़र्क है। हर बच्चा सीखे, इस हिसाब से स्कूल सिस्टम बनाया जाना चाहिए था। सिस्टम बच्चों के हिसाब बनना चाहिए था, लेकिन इसके विपरीत सिस्टम के हिसाब से बच्चों को ढाला जा रहा है। उन्हें सिस्टम में फिट करने की कवायद की जा रही है। बच्चों में जो कौशल विकसित होना चाहिए वो परीक्षा में अव्वल आने, अच्छे नंबर लाने के चलते हो नहीं पा रहा। समाज के हर क्षेत्र में कई ऐसे गुणी लोग हैं जिनका सान्निध्य और मार्गदर्शन बच्चों को देना चाहिए। सेमिनार में शामिल हुए लोगों ने मौजूदा एजुकेशन सिस्टम पर बात की। साथ ही होम स्कूलिंग, अनस्कूलिंग और सेल्फ लर्निंग जैसे नवाचारों की आवश्यकता भी समझाई।

एक्सपर्ट अर्चना गहलोत ने कहा, मौजूदा एजुकेशन सिस्टम का बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर ध्यान ही नहीa है। इसीलिए शहर में होम स्कूलिंग कॉन्सेप्ट तेज़ी से आकार ले रहा है। 50 से अधिक बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल नहीं जाते। वे सेल्फ लर्निंग कर रहे हैं। अनस्कूलिंग कॉन्सेप्ट में तो बच्चा खुद बताता है कि वह क्या और कैसे पढ़ेगा। इस तरह की लर्निंग बच्चे को डराती नहीं रिस्पॉन्सिबल बनाती है।

एक क्लास खत्म और दूसरा सब्जेक्ट शुरू नहीं होता

गुड़गांव से आईं स्टोरीटेलर सीमा वाही मुखर्जी ने कहा हर क्लास में 30-40 बच्चे होते हैं। सभी को अटेंशन नहीं मिलता। होम स्कूलिंग में कॅरिकुलम वही होता है। फर्क यह है कि इसे बच्चे घर पर रहकर पढ़ते हैं। यहां पर बेल बजते ही एक क्लास खत्म और दूसरा सब्जेक्ट शुरू नहीं होता। एसोसिएट प्रोफेसर आरती शर्मा ने कहा, स्कूल बच्चों की क्रिएटिविटी को नर्चर नहीं कर रहे हैं। मेरी बच्ची साढ़े छह साल की है। जब वह स्कूल से लौटकर आती है तो कहती है, आज स्कूल में मज़ा नहीं आया। कारण रेनी सीज़न के कारण टीचर आउटडोर एक्टिविटी नहीं कराते। इनडोर एक्टिविटी के नाम पर 20 दिन से एक ही कविता सिखा रहे हैं। जबकि मुझे खेलना है। इससे उसके बेसिक नेचर में बदलाव आने लगा है।

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