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मप्र / सबसे बड़ी चिंता हमारी सेहत, सबसे बड़ा संकट व्यापार पर असर, सबसे बड़ी खामी लचर सिस्टम



biggest concern is our health, the biggest crisis is the impact on business, the biggest drawback is the poor system
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biggest concern is our health, the biggest crisis is the impact on business, the biggest drawback is the poor system

  • कलेक्टोरेट पहुंचे व्यापारी बोले- मावे में फैट कम है तो उसे मिलावटी मानकर रासुका लगाना गलत
  • सैंपल जांच के लिए एक ही अधिकृत लैब, वह भी बोर्ड से प्रमाणित नहीं है

Dainik Bhaskar

Aug 14, 2019, 03:49 AM IST

इंदौर . मिलावट के खिलाफ मुहिम को लेकर इंदौर मावा विक्रेता संघ के लोग मंगलवार को कलेक्टोरेट की जनसुनवाई में पहुंचे। उन्होंने कहा मावे में केवल फैट कम होने के कारण उसे मिलावटी, अमानक मानकर एफआईआर करना व रासुका लगाना गलत है। जानवरों की खिलाई-पिलाई के ऊपर फैट निर्भर करता है और वैसे भी मावा बनाने वाला इन सभी के लिए जिम्मेदार है न कि इसे बेचने वाला। इसलिए इस तरह फैट कम होने के चलते मावा को मिलावटी मानने पर जुर्माने का जो प्रावधान है, वही होना चाहिए।

 

पदाधिकारियों ने मावे के परिवहन पर जांच के नाम पर लगी रोक का भी विरोध कर कहा कि इससे शहर में मावा आना बंद हो जाएगा। एक विक्रेता ने कहा गुजरात से मावे में शक्कर मिलाकर उसे बर्फी के नाम पर बुलाया जा रहा है। इसे उत्पाद मानकर इस पर कार्रवाई नहीं होती है लेकिन मावा विक्रेता को पकड़ा जाता है। एडीएम अजय देव शर्मा ने कहा आपकी वाजिब समस्याओं पर काम करेंगे लेकिन मिलावट हुई तो रियायत नहीं दी जाएगी। वहीं, मिलावट के खिलाफ कार्रवाई की समीक्षा के लिए कमिश्नर आकाश त्रिपाठी ने बुधवार को संभागीय बैठक बुलाई है।

 

नौ दुकानों से सैंपल लिए : खाद्य एवं औषधि विभाग के अफसरों ने मंगलवार को 56 दुकान स्थित मधुरम स्वीट्स से मावा, रेसकोर्स रोड स्थित नमकीन के कारखाने से मावा कतली, नरसिंह के नमकीन स्नेह नगर रोड से आलू पुदीना सेव, ओम किराना हीरा नगर चौराहा से दही, सांवरिया स्वीट्स एवं नमकीन हीरा नगर से बूंदी के लड्डू, मुरलीवाला स्वीट्स सहित नौ दुकानों से सैंपल लिए। इन्हें जांच के लिए भोपाल भेजा है।

 

डे ढ़-दो दशक से कैंसर, थायराइड, किडनी, काेलेस्ट्रॉल, रक्तचाप के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसका बड़ा कारण खाने-पीने की चीजों में मिलावट है। मिलावट के खिलाफ कार्रवाई तो की जाती है, लेकिन व्यापक पैमाने पर नहीं। यह इसलिए कि जिस तरह देश में पुलिस-नागरिक अनुपात पर्याप्त नहीं है, उसी तरह खाद्य सुरक्षा अधिकारी-नागरिक अनुपात भी पर्याप्त नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक 50 हजार की आबादी पर एक खाद्य सुरक्षा अधिकारी होना चाहिए, लेकिन मप्र में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के 275 पद मंजूर हैं, जिनमें से 163 ही भरे हैं। यानी, प्रत्येक 4 लाख 45 हजार 563 लोगों पर एक खाद्य सुरक्षा अधिकारी है। .

 

राज्य में लगभग 5.44 लाख पंजीकृत खाद्य व्यवसायी हैं। वहीं, खाद्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा लिए गए नमूनों की जांच एनएबीएल प्रमाणन (राष्ट्रीय प्रयोगशाला परीक्षण एवं मापांकन मान्यता बोर्ड) प्रयोगशाला में ही हो सकती है। राज्य में एकमात्र प्रयोगशाला भोपाल में है, लेकिन यह एनएबीएल से प्रमाणित नहीं है। इसलिए इसमें जांचे जा रहे नमूनों की रिपोर्ट की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। यह प्रयोगशाला दो खाद्य परीक्षकों के भरोसे है। दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों के नमूने धड़ल्ले से लिए जा रहे हैं पर यह नहीं देखा जा रहा कि इनकी जांच कब तक होगी और क्या जांच रिपोर्ट वैध मानी जाएगी?  - डॉ. मेघा पांडेय, असिस्टेंट प्रोफेसर विक्रम यूनिवर्सिटी उज्जैन 

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