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जानिए भोजशाला का इतिहास, यहां खुदाई में निकली थी मां की प्रतिमा

धार स्थित भोजशाला में वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित है। भोजशाला के नजदीक यह प्रतिमा खुदाई के दौरान मिली थी।

Rajeev Tiwari | Last Modified - Jan 22, 2018, 06:20 PM IST

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    मप्र के धार जिले स्थित भोजशाला में बसंत पंचमी पर हजारों लोग मां सरस्वती के पूजन को पहुंचे हैं।

    इंदौर।धार स्थित भोजशाला में धूमधाम से वसंतोत्सव मनाया जा रहा है। हालांकि ये जगह काफी तनावभरी है। खासकर तब जब शुक्रवार को बसंत पंचमी आती है। अयोध्या और काशी की तरह इस जगह को भी लेकर दो धर्मों का अलग-अलग दावा है। एक ही परिसर होने से हिंदू यहां दिनभर पूजा करना चाहते हैं तो मुस्लिम समाज नमाज अता करना चाहते हैं। दाेनों के इस विवाद ने सरकार भी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। हालांकि इस बार बसंत पंचमी सोमवार को होने से शांति के साथ पूजन किया जा रहा है। बसंत पंचमी के मौके पर दैनिक भास्कर डॉट कॉम बता रहा है भोजशाला विवाद की वजह और इतिहास...


    आखिर क्या है विवाद की वजह...

    भारतीय पुरात्तव विभाग के प्रावधान के मुताबिक हिंदुओं को हर मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को हर शुक्रवार को नमाज अता करने की अनुमति है। वसंत पंचमी पर भोजशाला में सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक पूजा-अर्चना करने का प्रावधान है। ऐसे में शुक्रवार को बसंत पंचमी आने पर विवाद की स्थिति निर्मित हो जाती है।


    - धार में परमार वंश के राजा भोज ने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया। 1034 में उन्होंने धार नगर में सरस्वती सदन की स्थापना की। यह एक महाविद्यालय था जो बाद में भोजशाला के नाम से मशहूर हुआ। राजा भोज के शासन में ही यहां मां सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा स्थापित की गई थी।


    महमूद खिलजी का निर्णय...
    उधर, 1305 से 1401 के बीच अलाउद्दीन खिलजी तथा दिलावर खां गोरी की सेनाओं से माहलक देव और गोगादेव ने युद्ध लड़ा। 1401 से 1531 में मालवा में स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना हुई। 1456 में महमूद खिलजी ने भोजशाला के भीतर मौलाना कमालुद्दीन के मकबरे और दरगाह का निर्माण करवा दिया। हालांकि, दरगाह बनने के कई सौ साल तक इस जगह पर विवाद नहीं हुआ।


    1909 से संरक्षित...
    1909 में धार रियासत द्वारा एनशिएंट मोन्यूमेंट एक्ट को लागू कर धार दरबार के गजट जिल्द में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया। बाद में भोजशाला को आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट के अधीन कर दिया गया।


    1935 में नमाज की अनुमति...
    धार स्टेट ने ही 1935 में भोजशाला परिसर में नमाज पढऩे की अनुमति दी थी। स्टेट दरबार के दीवान नाडकर ने तब भोजशाला को कमाल मौला की मस्जिद बताते हुए शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति वाला ऑर्डर जारी किया था। फिर दोनों समुदायों की ओर से नमाज और पूजा होने लगी।


    खुदाई में मिली है प्रतिमा...
    वाग्देवी की प्रतिमा भोजशाला के नजदीक खुदाई के दौरान मिली थी। इतिहासकारों के अनुसार, यह प्रतिमा 1875 में खुदाई में निकली थी। 1880 में 'भोपावर' का पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इसे अपने साथ लंदन ले गया। वहां के एक म्यूजियम में ये आज भी रखी हुई है।

    राम मंदिर आंदोलन के बाद होने लगा तनाव...
    राम मंदिर आंदोलन के बाद भोजशाला पर भी दोनों समुदायों की ओर से एकतरफा दावा किया जाने लगा। विवाद बढ़ने पर कई मर्तबा यहां तनाव और दंगे भी हुए। शुक्रवार के दिन वसंत पंचमी होने पर नमाज और पूजा के दौरान अक्सर यहां दो पक्ष आमने-सामने आ जाया करते हैं।

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    भोजशाला में मां वाग्देवी की पूजा होती है।
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    भोजशाला का मुख्य गेट।
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    परिसर में मंदिर और मस्जिद दोनों हैं।
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    बसंत पंचमी पर सुबह से शाम तक पूजन होता है।
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    मां की प्रतिमा खुदाई में मिली थी।
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Web Title: Basant Panchmi Special, History In Bhojshala Dhar Mp
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