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ड्रोन छिड़क रहा फसलों पर कीटनाशक, शायद ही देखा हो आपने पहले ऐसा

ड्रोन छिड़क रहा फसलों पर कीटनाशक, शायद ही देखा हो आपने पहले ऐसा

Danik Bhaskar

Dec 21, 2017, 12:36 PM IST
देखने पहुंच रहे हैं लोग। देखने पहुंच रहे हैं लोग।

इंदौर। खरगोन के बासवा में इन दिनों फसलों में हो रहे कीटनाशक छिड़काव को देखने दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। कीटनाशक छिड़काव तो हस समय होता है, लेकिन इस बार जिस तकनीकी से इसे किया जा रहा है वह अपने आप में अनोखा है। यहां खेतों के ऊपर उड़ता ड्रोन देख हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। क्योंकि कीटनाशक का छिड़काव कोई मजदूर नहीं बल्कि ड्रोन द्वारा किया जा रहा है।


- खरगोन के बमनगाव में किसान सेवकराम पिता गणपति ने अपने खेत में ड्रोन के माध्यम से चने की फसल में दवाई का छिड़काव कराया है। किसान ने बताया दो एकड़ खेत में मात्र 30 मिनट में दवाई का छिड़काव ड्राेन के माध्यम से हो गया, जबकि मजदूरों से यही काम कराने में लगभग आधे से एक दिन का समय लगता है। ड्रोन से कीटनाशक का छिड़काव एक निजी कंपनी ट्रायल के रूप में नि:शुल्क कर रही है।


- कंपनी इस नई तकनीकी से होने वाले फायदे किसानों को प्रयोग के ताैर पर बता रही है। किसान के अनुसार तेज पंखा घूमने से फसल पर लगी इल्ली व अन्य कीट भी हवा से जमीन पर गिर जाते हैं। इससे फसलों को अधिक लाभ होता है। साथ ही दवाई उड़ने से किसानों को होने वाली बीमारी से भी निजात मिलेगी।

तीन घंटे में 12 एकड़ में छिड़काव
किसान संदीप सिंह तोमर ने बताया कि मैंने 12 एकड़ में ड्रोन के जरिए कीटनाशक का छिड़काव करवाया है। इसके पहले जब हम इतने ही एकड़ में मजदूर द्वारा छिड़काव करवाते थे तो इसके लिए एक से दो दिन लग जाते थे, जिसे ड्राेन के जरिए मात्र तीन घंटे में हो गया। तोमर की माने तो ड्रोन से छिड़काव प्रॉपर तरीके से होता है। एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ में हाथ से छिड़काव करने पर 100 लीटर पानी लगता है, जबकि ड्रोन से 20 लीटर पानी लगता है। अलग-अलग कंपनियों के कीटनाशक की मात्रा अलग-अलग होती है, लेकिन एक आंकड़ा निकाले तो एक एकड़ में 100 ग्राम दवाई का लगती है।


- तोमर ने बताया कि इस ड्रोन में आठ लीटर घोल की क्षमता वाली टंकी लगी है। जर्मन टेक्नोलाॅजी के इस ड्रोन में अलग-अलग से में बने पार्ट लगे हैं। कंपनी अपने इस प्रोजेक्ट के तहत अब तक क्षेत्र में 300 एकड़ में छिड़काव कर चुकी है। इनका टारगेट है कि निमाड़ में करीब डेढ़ हजार एकड़ तक पहुंचा जाए।

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