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माशूका के लिखे ७०-७५ खत उसी को लौटा दिए, पढ़ें, मशहूर शायर मुनव्वर राना की पूरी स्टोरी

माशूका के लिखे ७०-७५ खत उसी को लौटा दिए, पढ़ें, मशहूर शायर मुनव्वर राना की पूरी स्टोरी

Dainik Bhaskar

Dec 12, 2017, 10:57 AM IST
शायर मुनव्वर राना ने शायरी, शो शायर मुनव्वर राना ने शायरी, शो

इंदौर। वोबड़े ऐहतराम से मिलते हैं... सभी से। बड़ी-बड़ी गहरी उनकी आंखें मुस्कराती हैं और अपना बना लेती हैं अनजानों को भी। मुनव्वर राना से ऐसी ही एक मुलाक़ात सोमवार दोपहर हुई। बेतकल्लुफ होकर उन्होंने शायरी, शोहरत, इश्क-ओ-मोहब्बत, ज़िंदगी और दु:ख-दर्द की बातें की। कभी मां, पिता और उस्ताद को याद कर भावुक हुए, नाज़ुक पलों में आंखेें भी भर आईं। बोलते बोलते गला रूंधा तो कुछ देर रुके भी और फिर शिद्दत से बात जारी रखी। कहते हैं मैं तो वकील या प्रोफेसर बनना चाहता था लेकिन कारोबार करते ज़िंदगी के एक नाजुक मोड़ पर शायर हो गया। पढ़िए उन्हीं की जुबानी....


- मैंने अपनी मां को ताउम्र नमाज़ पढ़ते देखा। वह वहीं सज़दा करती, वहीं बैठी रहती और वहीं सो जाती थी। घर में चूल्हा जलने का इंतज़ाम भले होे, बोरों के परदों का इंतजाम रहता था। मेरी मां के हिस्से में दो जायदाद आई थीं, एक मेरे पिता जो दर-दर भटकते रहते थे और हम उसके बच्चे। तब मेरी उम्र दो-ढाई बरस रही होगी। ज़िंदगी बहुत मुश्किलों में बीती। जब मैं 18-19 साल का हुआ तो इस उम्र में दूसरों लड़कों को जब लड़कियां पसंद आती थी, मैं बरात में गैस की बत्तियां ले जाते बच्चों को देखता था। अपने बेनूर चेहरों के साथ वे अपने सिर पर ये बत्तियां लेकर चलते थे। उनकी नाज़ुक गर्दनें हिलती रहती थीं। ज़िंदगी में मुश्किलोंं से गुजरने के कारण ही पूरी ज़िंदगी दु:ख पर पहले निगाह जाती है, सुख पर बाद में। अजीब तरह से यह ज़िंदगी गुजरी।

माशूका के लिखे 70-75 खत उसी को लौटा दिए
हम आवारागर्दी करते रहते थे। बटेरबाज़ी और पतंगबाज़ी में वक्त बीतता था। अब्बा बीमार हुए तो अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। बिस्तर पर लेटे हुए मेरी तरफ देखा, कहा- एक बात कहूं बेटा। मैंने कहा, कहो अब्बा। बोले-बेटा मैं यदि अस्पताल से वापस घर लौट सकूं तो अपनी मां-भाइयों को शर्मिंदा मत होने देना। तब से हर तरफ से ध्यान हटाकर कारोबर पर ध्यान लगाया। तब हालात अच्छे नहीं थे, तब मेरी मोहब्बत भी डूब गई। माशूका के लिखे 70-75 खतों को उसे बुलाकर वापस लौटा दिया। बीवी को गरीबी में भी ऐसे रखा जैसे मुकद्दस किताबोंं में मोरपंख को रखा जाता है।

मोहल्ले की छतें मेरी मौसियों-बुआओं की मानता था
हमारे खानदान के कुछ लोग विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए। 80 साल के एक चचा अब भी पाकिस्तान में हैं और हिंदुस्तान के अपने गांव-खेड़े और मोहल्ले को याद करके रोते रहते हैं। दादी की ज़िद के कारण उन्हें जाना पड़ा। मैं जिस दिन बहुत ताकतवर हो गया तो अपने दादा और खानदान के दूसरे लोगों की कब्रें पाकिस्तान से खींच लाऊंगा और रायबरेली मेेें अपने खानदान के बाकी लोगों के कब्रों की मिट्टी में मिला दूंगा। मैं 15-16 साल की उम्र तक हिंदू-मुसलमान जानता तक नहींं था। जिस मोहल्ले मैं रहता था वहां रहने वाले लोगों की छतें मेरी मौसियों और बुआओं की ही मानता रहा।


पूरी ज़िंदगी दु:ख पर निगाह पहले गई, सुख पर बाद में...
ज़िंदगीमें बहुत मोहब्बतें मिली, इज्जत मिली। ज़िंदगी के हर हिस्से में हैसियत हासिल की। मोहब्बत का ग़म गलत करने के लिए शायरी की। लोग कहते हैं आपने बहुत हाईट पाई है। ये मेरी हाईट नहीं है। मुझे मेरे उस्ताद का आशीर्वाद मिला है। मैं यह महसूस करता हूं कि उस्ताद ने मुझे अपने कंधे पर बैठाए रखा है और लोगों को लगता है कि यह मेरी हाईट है। उन्होंने डांंट-डपटकर, मोहब्बत से शेर कहना सिखाया।

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