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नागयज्ञ के बाद यहां बना गया था १५० फीट ऊंचा राख का टीला, आज यहां हजारों सांप रहते हैं

नागयज्ञ के बाद यहां बना गया था १५० फीट ऊंचा राख का टीला, आज यहां हजारों सांप रहते हैं

Rajeev Tiwari| Last Modified - Feb 12, 2018, 10:55 AM IST

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Mahashivratri Special, interesting history of Nagdah tekri nagda mp
ऐसी मान्यता है कि महाभारतकाल में जन्मेजय ने नागदा में नागयज्ञ किया था।

इंदौर। मप्र के ने नागदा को नागदाह के नाम से भी जाना ताजा है। नागदाह नाम पड़ने के पीछे का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। क्योंकि नागदा वही स्थान है जहां पर राजा जन्मेजय ने नाग यज्ञ किया था। इस यज्ञ में नागों की आहुति दी गई थी। नागों की आहुति से यहां 150 फीट ऊंचा राख का टीला बन गया था, जो अाज भी मौजूद है। महाशिवरात्रि के मौके पर dainikbhaskar.com बता रहा है इस टीले के बारे में....


 - ऐसी मान्यता है कि नागदा स्थित जूना नागदाह यज्ञ टेकरी पर 2200 ईसा पूर्व यानि 4 हजार साल पहले महाभारत काल के समय राजा परीक्षित के पुत्र राजा जन्मेजय ने यहां एक नाग यज्ञ किया था।
 - इसके बाद यहां सांपों की आहुतियों की राख से बना 150 फीट ऊंचा एक टीला बना गया था, जो कि आज भी यहां मौजूद है। हालांकि क्षण के कारण अब इसकी ऊंचाई 70 फीट रह गई है।
 - टेकरी के आसपास 500 से अधिक बिल हैं, जिसमें सांप रहते हैं। हालांकि यहां रहने वाले सांपों की संख्या का आंकलन लगाना मुश्किल है। बंटू बोड़ाना, पार्षद प्रमोद चौहान ने बताया टेकरी के समीप अभी भी सापों का बसेरा है। दिन में भी सांप दिखना यहां आम नजारा है।
 -1995 में डॉ. वाकणकर के नेतृत्व में दल यहां पहुंचा था और टीले से जुड़े इतिहास को खंगाला था। हालांकि पुरातत्व विभाग टेकरी के इतिहास को लेकर अभी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है, इसलिए इसके रखरखाव की प्रक्रिया धीमी गति से चल रही है। 
 - दूसरी ओर 2016 में पर्यटन विकास निगम ने टेकरी से मिट्‌टी के कटाव को रोकने के लिए चारों ओर बांउड्रीवॉल बनाने का एस्टीमेट तैयार किया था, जिस पर काम किया जा रहा है।
  
 इस नाग मंदिर से भी जूड़ा है टेकरी का इतिहास
 - पाड़ल्या कला स्थित नवकली नाग महाराज मंदिर की कहानी नागदाह यज्ञ टेकरी से जुड़ी है। मंदिर में पिछले 25 सालों से सेवा करने वाले पंडा मानसिंह चाैधरी बताते हैं नागों के दहन के लिए राजा जन्मेजय ने जब यज्ञ किया था तब आठ कलियां जल गई थीं और नौवीं कली को भगवान विष्णु व भोलेनाथ ने बचा लिया था। उसके कुछ समय बाद पाड़ल्या कला में जमीन से यह कलियां प्रकट हुई थीं। तभी से यह कलियां आज भी मंदिर में स्थापित है। खास बात यह है इन कलियों के बीच व साइड में बिल भी है। जिनमें सर्प रहते हैं। मंदिर के आसपास अक्सर सांप घूमता दिखाई दे जाते हैं।
  
 ऐसी है कहानी...
 - पौराणिक कथा के अनुसार एक बार राजा परीक्षित शिकार के पीछे-पीछे जंगल में काफी दूर तक निकल गए। भूख प्यास और थकान मिटाने के लिए राजा जंगल में भटकने लगे। इसी दौरान उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया। राजा आश्रम में पहुंचे तो एक ऋषि यहां ध्यान में दिखाई दिए। राजा के कई बार पुकारने पर भी जब उन्होंने आंखें नहीं खोली तो क्रोधित होकर राजा ने समीप पड़े एक मृत सांप को बाण बनाकर उनके गले में मार दिया, जो ऋषिक के गले से लिपट गया। इसकी जानकारी जब ऋषि के पुत्र को लगी तो उन्होंने श्राप दे दिया कि आपकी मौत सांप के डंसने से होगी। जब इसकी जानकारी राजा के पुत्र जन्मेजय को लगी तो उन्होंने नागयज्ञ का निश्चय किया, जो कि जनमेजय नागयज्ञ के नाम से जाना जाता है।

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नागयज्ञ के आहुति से यहां 150 फीट ऊंचा टीला बन गया था।
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आज भी इस टीले में हजारों की संख्या में सांप रहते हैं।
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टीले में बड़ी संख्या में बिल हैं।
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टीले के किनारे से एक नाला भी निकला है।
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टीले के ऊपर से ऐसा दिखता है नागदा।
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