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ये हैं यूनिक शिव मंदिर, डाक भेजने के लिए बना स्तंभ ले चुका है शिवलिंग का रूप

ये हैं यूनिक शिव मंदिर, डाक भेजने के लिए बना स्तंभ ले चुका है शिवलिंग का रूप

Dainik Bhaskar

Feb 13, 2018, 12:14 PM IST
1920 से पहले इंदौर व देवास के बीच 1920 से पहले इंदौर व देवास के बीच

इंदौर। महाशिवरात्रि पर देशभर में भोलेनाथ की आराधना का दौर जारी है। उज्जैन में बाबा महाकाल और खंडवा में ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग में लाखों की संख्या में भक्त बाबा के दर्शन को पहुंचे। इस सबसे अलग इंदौर और आसपास कुछ ऐसे मंदिर भी है जो अनोखे हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर dainikbhaksar.com कुछ ऐसी ही यूनिक जानकारी बता रहा है....

अंग्रेजों के समय तार बांध भेजी जाती थीं चिटि्ठयां

शिप्रा : 1920 से पहले इंदौर व देवास के बीच डाक भेजने के लिए अंग्रेजों ने दोनों किनारे स्तंभ बनाए थे। इनके बीच तार बांध चिट्‌ठियां भेजी जाती थी। पुल बनने के बाद भी स्तंभ खड़े रहे। 4 साल पहले देवास तरफ वाले स्तंभ को शिवलिंग का आकार देकर पूजा शुरू कर दी।


राजबाड़ा : मल्हारी मार्तंड मंदिर के ठीक सामने पांच फीट ऊंचा शिवलिंग है। इस पर करीब छह फीट ऊंचा शेषनाग है। यह शिवलिंग 12 साल पहले मंदिर के जीर्णोद्धार के दौरान स्थापित किया गया था। मंदिर में हैदराबाद से बुलवाई गई अर्धनारीश्वर स्वरूप, पार्वती, शिव-पार्वती पर आधारित आठ मूर्तियां भी हैं।

अपनी तरह का तीसरा ऐसा मंदिर

पंचकुइया : द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर में एक ही मूर्ति में 12 ज्योतिर्लिंग हैं। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर और मंदसौर के पशुपतिनाथ के बाद इंदौर के इस मंदिर में ठीक वैसी ही मूर्ति है।

वृशावाहनमूर्ति में शिव का नया रूप
राजबाड़ा : मल्हारी मार्तंड मंदिर में रखी है यह मूर्ति। इसमें शिवजी का शरीर खुला व मणिरत्नों से जड़ा है। उनके चेहरे पर कृपापूर्वक मुस्कान है और वे शिथिलमय लग रहे हैं। पत्नी पार्वती के साथ खड़े शिवजी का दायां हाथ नंदी पर रखा हुआ है।

देश में सिर्फ दो ही शिव मंदिर हैं 'विरुपाक्ष' नाम के

- रतलाम से 17.8 किमी दूर बिलपांक स्थित विरुपाक्ष महादेव मंदिर। परमार-चालुक्य शैली वाले शिवालय का इतिहास उज्जैन के महाकाल मंदिर से भी पुराना है। शैलचित्र शोध संस्थान व भारती कला भवन उज्जैन के तत्कालीन निदेशक डॉ. वि. श्री. वाकरणकर के शोध व मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का जीर्णोद्धार संवत 1198 में हुआ। जीर्णोद्धार अनहिलपाद के चालुक्यवंशी राजा सिद्धराज जयसिंह ने कराया था। महाकाल मंदिर का शिलालेख संवत 1199 का है। देश में विरुपाक्ष नाम का एक मंदिर कर्नाटक के हम्पी में भी है। 7वीं सताब्दी में बने इस मंदिर को यूनेस्को ने संरक्षित घोषित किया है। बिलपांक का विरुपाक्ष मंदिर भी संरक्षित घोषित है।

- स्थापत्य कला की दृष्टि से ऊन व उदयेश्वर के शिव मंदिर व इसमें काफी साम्यता है। यहां 5.20 वर्गमीटर के गर्भगृह में पीतल की चद्दर से आच्छादित 4.14 मीटर परिधि वाली जलाधारी व 90 सेंमी ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। 64 स्तंभ वाले सभागृह में एक स्तंभ मौर्यकालीन भी है। यहां 75 वर्षों से हर शिवरात्रि पर महारुद्र यज्ञ होता है जिसमें खीर का प्रसाद ग्रहण करने दूर-दूर से बड़ी संख्या में नि:संतान दंपती आते हैं। मप्र पर्यटन विकास निगम अध्यक्ष तपन भौमिक ने यहां भव्य प्रवेश द्वार और पर्यटक भवन बनाने की बात कही है।

नर्मदा-महेश्वरी नदी के संगम के जलमग्न महादेव, कम पानी में ही दर्शन

- महेश्वर शिवालय नर्मदा नदी एवं महेश्वरी नदी के संगम स्थल पर स्थापित है। नदी के अंदर शिवालय के दर्शन विशेषकर गर्मी के दिनों में होते हैं। इसके अलावा नर्मदा में जलस्तर कम होने के बाद पूरे दर्शन होंते हैं। सालों पहले शिव लिंग के आसपास पत्थर का चबूतरा भी बना हुआ था। बाढ़ के कारण पत्थरों के कारण चबूतरा क्षतिग्रस्त हो चुका है। नर्मदा के अंदर शिव लिंग के आसपास नर्मदा किनारे ज्वालेश्वर और कालेश्वर महादेव मंदिर के साथ सात माता मंदिर भी स्थापित है। यहां महाशिवरात्रि व श्रावण के अलावा नवरात्रि में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

गौरी-सोमनाथ महादेव... कभी दिखता था भूत व भविष्य
- ओंकारेश्वर पर्वत के गौरी-सोमनाथ महादेव को परमार कालीन माना जाता है। किवंदती है कि पूर्व में इस विशाल शिवलिंग में मनुष्य को अपने भूत के साथ भविष्य कालीन रूप दिखाई देते थे। इस चमत्कार की सत्यता जानने औरंगजेब भी यहां आया तो उसे अपने दोनों रूप प्रतिकूल व अप्रिय दिखाई दिए। इस पर उसने शिवलिंग में आग लगा दी। तभी से शिवलिंग की यह अद्भुत शक्ति समाप्त हो गई। शिवलिंग काला होने के साथ उसमें दरार आ गई। शिवलिंग इतना बड़ा है कि दो व्यक्ति मिलकर भी अपनी भुजाओं से नहीं नाप सकते। मान्यता यह भी है कि मामा-भानजे इस शिवलिंग को अपनी बाहों में समा लेते हैं तो वे मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

इतिहास : इस शिवलिंग की स्थापना 15वीं शताब्दी में परमारों ने की थी। तीन मंजिला मंदिर वास्तुकला की भूमिज शैली से बना है। मंदिर का सभा मंडप ध्वस्त हो चुका है। दोनों मंजिलें व गर्भग्रह सुरक्षित है। वर्तमान में यह राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है। सरकार की ओर से यहां जीर्णोद्धार का कार्य किया जा रहा है।

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