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इन्होंने मंच पर मोदी-जसोदाबेन को लेकर कही ये बात, नीचे उतर कहा इसे मत लिखना

इन्होंने मंच पर मोदी-जसोदाबेन को लेकर कही ये बात, नीचे उतर कहा इसे मत लिखना

Rajeev Tiwari | Last Modified - Dec 18, 2017, 11:52 AM IST

इन्होंने मंच पर मोदी-जसोदाबेन को लेकर कही ये बात, नीचे उतर कहा इसे मत लिखना

इंदौर। इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल में सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा की लेखिका नीलिमा डालमिया आधार मंच पर थीं। उनकी किताब पर हुए चर्चा सत्र के बाद एक सज्जन ने पूछा कि गांधी के बारे में अापने बहुत कुछ लिखा है। नरेंद्र मोदी के बारे में आप क्या सोचती हैं? लोग अक्सर कहते हैं कि मोदी और गांधी में कई समानताएं हैं। नीलिमा ने जवाब दिया “समानता तो उन दोनों में मुझे कोई नज़र नहीं आती सिवाय इस बात के कि नरेंद्र मोदी ने भी जसोदाबेन को उतना ही त्रास दिया जितना महात्मा गांधी ने कस्तूरबा को दिया। मंच पर तो नीलिमा बेबाक बोलीं, लेकिन नीचे आने के बाद के बाद दैनिक भास्कर संवाददाता से कहा नरेंद्र मोदी-जसोदाबेन वाला किस्सा मत लिखना।



- लेखिका नीलिमा ने आगे कहा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले मैं उनकी फॉलोअर और सपोर्टर थी। मैं मानती थी कि उनके दिल में हिंदुस्तान धड़कता है। वो एक संदेश लिए चल रहे हैं और भारत के हर आदमी तक उसे पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने बाद स्थिति इसके बिलकुल उलट हो गई। मेरे एक मित्र हैं जो मुस्लिम हैं। उन्होंने मुझसे कहा तुम्हारी अगली किताब जसोदाबेन पर होना चाहिए। मैंने कहा तुम मेरा देश निकाला क्यों करवाना चाहते हो।

नीलिमा ने कहा "मेरी किताब बापू की नहीं, मोहनदास नाम के एक पुरुष की कहानी है'
Q. जिस तरह कस्तूरबा ने जीवन जिया, क्या आप उससे खुश हैं ?
- नहीं। कस्तूरबा कभी उनके खिलाफ नहीं गईं। वो कभी नहीं बता पाई उनके बच्चों को तुम्हारे पिता तुम्हारे साथ अन्याय कर रहे हैं। वो 13 साल की थी जब उसकी शादी हुई थी। 64 साल उसने अपनी ज़िंदगी के बापू के साथ बिताए थे। अपने जीवन की कल्पना उनके बगैर वो कर ही नहीं पाई। खुद के लिए न सही लेकिन अपने बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए था।
Q. कस्तूरबा से आज की स्त्री क्या सीख सकती है ?
- सहनशीलता।
Q. अपनी इस किताब में गांधी को किस रूप में प्रस्तुत किया है आपने?
- उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने नहीं दिया। हरिलाल को इंग्लैंड से लॉ करने की स्कॉलरशिप मिली। गांधी जी ने वह आश्रम के अन्य लड़के को दे दी। ताकि लोग उन पर अंगुली न उठे। दूसरे बेटे मणिलाल जब 20 साल के थे तब जोहेनसबर्ग आश्रम में ललिता नाम की लड़की को पसंद करने लगे। एक दिन स्वीमिंग पूल में उनका हाथ किसी और लड़की को लग गया। इस पर मणि आश्रम से बाहर कर दिए गए और दोनों लड़कियों के बाल काट दिए गए। किसी महिला के बाल यूं काट देना उससे उसका सम्मान छीन लेना है।
Q. अपनी किताब में कस्तूरबा के किस पहलू को दिखाना चाहती थीं?
- कस्तूरबा पतिव्रता हिंदू नारी थीं। वो गांधी की क्रूरता से उसके बच्चों को बचा नहीं पा रही थी। कस्तूरबा के घाव मेरी मां के घावों से मिलते-जुलते थे। मेरे पिता आर के डालमिया की छह बीवियां रहीं। हम 18 भाई बहनों का बचपन सामान्य बच्चों जैसा नहीं था। पिता होते हुए भी पिता के दुलार को तरसते रहे हम। कस्तूरबा की कहानी में मुझे मेरी मां दिखीं और हरिलाल के ज़ख्म मेरी देह पर नज़र आए। वो पूरे राष्ट्र के पिता थे लेकिन उन्हीं के बच्चे उनके स्नेह को तरसते रहे।
Q. राष्ट्रपिता के खिलाफ क्यों लिखा आपने ?
- मेरी यह किताब महात्मा गांधी की कहानी नहीं है, यह किताब मोहनदास नाम के एक पुरुष की कहानी है। और जहां तक साहस का सवाल है तो वह मुझे अपने पिता से मिला है। मां से मिला है जिसने मेरे पिता के जुल्मों को सहा।
Q. जब यह किताब मार्केट में आई तब इसे रिसीव कैसे किया गया ?
अहमदाबाद में सबसे जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला। लोगों ने मुझे चिटि्ठयां लिख कहा कि कस्तूरबा से मिलाने का शुक्रिया। मुझे लगता है अब लोग तैयार हैं उस सच को सुनने के लिए जिसे अरसे से दबाया जाता रहा है।
मंच पर तो नीलिमा बेबाक बोलीं, लेकिन नीचे आने के बाद के बाद सिटी भास्कर संवाददाता से कहा नरेंद्र मोदी-जसोदाबेन वाला किस्सा मत लिखना।
Q. राष्ट्रपिता के खिलाफ क्यों लिखा आपने ?
- मेरी यह किताब महात्मा गांधी की कहानी नहीं है, यह किताब मोहनदास नाम के एक पुरुष की कहानी है। और जहां तक साहस का सवाल है तो वह मुझे अपने पिता से मिला है। मां से मिला है जिसने मेरे पिता के जुल्मों को सहा।
Q. जब यह किताब मार्केट में आई तब इसे रिसीव कैसे किया गया ?
अहमदाबाद में सबसे जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला। लोगों ने मुझे चिटि्ठयां लिख कहा कि कस्तूरबा से मिलाने का शुक्रिया। मुझे लगता है अब लोग तैयार हैं उस सच को सुनने के लिए जिसे अरसे से दबाया जाता रहा है।
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